गांव का कोई भविष्य नहीं है,भविष्य है शहरों का -ओशो

एक मित्र ने पूछा है कि आप यह मानते हैं कि विनोबाजी के सर्वोदय से समाजवाद आ सकेगा?

विनोबाजी का सर्वोदय हो या गांधीजी का, समाजवाद उससे नहीं आ सकेगा क्योंकि सर्वोदय की पूरी धारणा ही मनुष्य को आदिम व्यवस्ता की तरफ लौटाने की है। सर्वोदय की धारणा ही पूंजीवाद की विरोधी है। लेकिन पूंजीवाद से आगे ले जाने के लिए नहीं समाजवाद से पीछे ले जाने के लिए है। पूंजीवाद से दो तरह से छुटकारा हो सकता है। या तो पूंजीवाद से आगे जाएं या पूंजीवाद से पीछे लौट जाएं। लौटना कुछ लोगों को सदा सरल मालूम होता है औक आकर्षक भी। लेकिन पीछे लौटना न तो संभव है नही उचित ही। जाना सदा आगे ही पड़ता है- चाहे मजबूरी में या स्वेच्छा से। जो मजबूरी में जाते हैं वे घिसचते हुए पशुओं की तरह जाते हैं। जो स्वेच्छा से जाता है उसकी चाल में एक गति, एक आनंद और भविष्य को पाने की स्फूर्ति, खुशी, आशा और सपना होता है। इस हमारे देश में पीछे की तरफ जाने की बात इस कदर घर कर गई है कि जब भी मुसीबत हो हम पीछे की करफ हटना चाहते हैं। उसके कारण मनोवैज्ञानिक हैं। उन्हें थोड़ा समझना चाहिए। पहली बात यह है प्रत्येक मनुष्य के मन में यह विचार है कि पहले सब अत्छा था, गांव अच्छे थे, शहर बुरा है। क्योंकि शहर नया है गांव पुराना। लेकिन ये बाते वेही लोग कहते हैं जो शहरों में रहते हैं, गांववाले नहीं। गांव की जिंदगी एक दिन घूकर देख आना और बात है और गांव में जीना बिल्कुल और बात है। साथ ही मजा यह है कि सर्वोदय पर और गांव पर और प्राचीन ग्रामीण व्यवस्था पर, पंचायत व्यवस्ता पर जिन लोगों का बहुत जोर है वे सब गांव में ही रहते हैं। सब शङरों में ही रहते हैं।शहरों में वे किताबें लिखते हैं गांवों की सुंदर, प्राकृतिक जिंदगी के संबंध में। यह भ्रम जो हम पालते हैं मनमोहक होते हैं लेकिन खतरनाक हैं।

गांव का कोई भविष्य नहीं है। भविष्य है शहर का। आनेवाली दुनियां में गांव नहीं होगा होंगे शहर, और बड़े शहर, जिनके लिए हम कल्पना भी नहीं कर सकते। गांव जो है वह वैसा ही है जैसे झोपड़ा है। आनेवाली दुनियां में झोपड़ा नहीं होगा, गांव भी नहीं होगा। असल में आनेवाली दुनियां ग्रामीण की नहीं नागरिक की दुनियां होनेवाली है।

सच तो यह है कि जैसै-जैसे हम आगे बढ़ेगे वैसे–वैसे आदमी जमीन से मुक्त होगा और जबतक आदमी जमीन से पूरी तरह मुक्त नहीं होता तब तक वह पूरी तरह सुसंस्कृत नहीं हो पाएगा। आदमी निरंतर मुक्त हो रहा है बहुत चीजों से लेकिन भोजन के लिए जमीन से मुक्त नहीं हो पाया है –लेकिन हो सकता है। और मेरा समझ में तकनीक का विकास उसे जमीन के ऊपर अनिवार्य रूप से भोजन के लिए निर्भर रहने से मुक्त कर देगा। जमीन पर निर्भर रहने की बात आगे संभव नहीं है। जमीन छोटी पड़ गई है लोग ज्यादा हो गए हैं। और किसान जो है, कृषि जो है वह अत्यंत पुरानी बात है –इस बीसवीं सदी से, विकसित टेक्नालाजी से जिसका बहुत गहरा संबंध नहीं हो सकता। भोजन के नए-नए मार्ग खोज लिए जाएंगे। भोजन के लिए मनुष्य जबतक जमीन से छुटकारा नहीं होता तबतक दुनिया की जीनता और दरिद्रता पूरी तरह मिटनेवाली नहीं है। क्योंकि जमीन छोटी पड़ गई है लोग ज्यादा हो गए हैं। मृत्यु दर हमने कम कर दी है और जन्म दर कम करना असंभव मालूम पड़ रहा है। सर्वोदय भूमि से बंधा आंदोलन है. वह अतीत की तरफ ले जानेवाला आंदोलन है। वह भविष्य की तरफ ले जानेवाला आंदोलन नहीं है। भूमि से बंधे आंदोलन का कोई भविष्य हो भी नहीं सकता।

दूसरी मजे की बात यह है कि सर्वोदय की सारी चिंतना, त्याग, सरलता, साधुता आदि पर खड़ी हुई है। यह त्याग सरलता और साधुता हजारों साल से आदमी को सिखायी गईं बातें हैं। कोई मानता नहीं। सरलता जीवन का हिस्सा नहीं है। जीवन का सहज हिस्सा है – विस्तार और जटिलता। ध्यान रहे कि जीवन का विकास जटिलता की तरफ है।अमीबा है एक छोटा सा  पहला प्राणी जिससे मनुष्य विकसित हुआ। अमीबा के पास एक ही सेल है। वह एक ही सेल जीता है। बिल्कुल सरल प्राणी है। लेकिन न बुद्धि हो सकती है उसमें न कुछ और हो सकता है। बस जी सकता है। श्वांस ले सकता है और मर जाता है। अमीबा सरल प्राणी है। फिर जटिलता सुरू हो जाती है. जैसे-जैसे विकास बढ़ता है। वंदर कम जटिल है। आदीवासी कम जटिल है। बम्बई का निवासी ज्यादा जटिल है। जितनी जटिलता बढ़ती जाती है मस्तिष्क की, व्यक्तित्व, उतना ही विकास होता है।

गांधीजी और विनोबाजी सरलता के पुराने आदर्श से पीड़ित हैं। उन सबका मानना है कि जीवन सरल हो, थोड़ी आवश्यकताएं हों, छोटा झोपड़ा हो, दो कपड़े हों, चरखे से काम चल जाए। जमीन पर खोदकर थोड़ी सी पैदावार हो जाए तो बहुत अच्चा।। साधन की जरूरत न हो, उपकरण का उपयोग न हो। लेकिन स्वाभाविक हैं ये मांगे। ये स्वभाव की तरफ लौटने की बाते बहुत अस्वाभिक हैं। आदमी निरंतर जाता है जटिलता की और आदमी निरंतर जाता है आवश्यकताओं को बढ़ाने की ओर। दुनियाभर के शिक्षक चिल्ला –चिल्ला कर हार गए कि आवश्यकताएं कम करो। आवश्यकताएं कम नहीं हो सकतीं. जीवन का लक्षण ही मह नहीं है। जीवन आवश्यकताएं बढ़ाता है। मरना हो आवश्यकताएं कम की जा सकती हैं और आवश्यकताएं बिल्कुल कम कर दी जाएं तो अंतत मरने के अलावा कोई उपाय रह भी नहीं दाता है।

जीवन है विस्तार, फैलाव है आवश्यकताओं का। जितनी फैलती हैं मनुष्य उतना ही उत्पादन करता है। जितनी आवश्यकताएं फैलती है उतना ही विस्तार करता है। जितनी आवश्यकताएं फैलती हैं उतने ही मस्तिष्क के अवरूद्ध हिस्से सक्रिय होते हैं। जितनी आवश्यकताएं फैलती हैं उतना ही मनुष्य पशु से मुक्त होता है। पशु के पास बहुत थोड़ी आवश्यकताएं हैं इसलिए वह पशु है। अगर आवश्यकताएं बहुत कम की जाएं तो आदमी को पशु के स्तर पर ही जीना होगा। उसकी मनुष्यता थोथी हो जाएगी। आदमी होने का मतलब है जटिल आवश्यकता के विस्तार से भरा हुआ जीवन।