व्यंग्यः प्रेम का आपातकाल बनाम स्वर्णिम काल

‘वो’ प्रेम का आपातकाल था। यह प्रेम का स्वर्णकाल है। ‘वो’ यानि वह दौर, जब हम अपने कस्बे में इश्क की संभावनाएं उसी शिद्दत से खंगाल रहे थे, जैसे हेमंत बिरजे और चंकी पांडे जैसे कलाकर बॉलीवुड में सफलता खंगाल रहे थे। बाप-दादा के कालखंड में प्रेम की खंड-खंड संभावनाओं को हमने देखा ही नहीं, तो उस पर नो कमेंट।

हमारे जमाने में लड़की से बात करना ओलंपिक मेडल जीतने सरीखा था। उस वक्त जिस तरह ओलंपिक से भारतीय खिलाड़ी प्रायः बिना पदक लिए ही वापस आते थे, उसी तरह 99.99 फीसदी मामलों में लड़के भी बिना बात किए ही वापस लौट आते थे। अपवाद के तौर पर पूरे कस्बे में एक-दो वीर बहादुर ही होते थे, जो बिना धरे और बिना ठुके यह कारनामा कर दिखाते थे। लड़की से दो-चार बार, दो-चार मिनट की बात को ही अफेयर का पर्यायवाची मान लिया जाता था।

कुछ-कुछ ऐसा ही हाल लड़कियों का भी था। लेकिन लड़कों के लिए वक्त बहुत विकट था। एक तथाकथित अफेयर के लिए लड़के को कतार में लगे कम से कम पांच अन्य लड़कों को ठोंक-पीटकर रास्ते से हटाना होता था। वर्तमान शहरी वेलेंटाइंस पीढ़ी उन लड़कों का दर्द कभी समझ ही नहीं सकती, जो पांच लड़कों का सिर और किस्मत फोड़कर प्रथम आवेदक के रूप में आवेदन करते थे और लड़की यह कहते हुए आवेदन रद्द कर देती थी कि पापा लव मैरिज के खिलाफ हैं। मतलब तब डेटिंग का कोई सीन ही नहीं था। प्रेम आवेदन को सीधे शादी का प्रस्ताव समझा जाता था।

आर्थिक उदारीकरण के बाद प्रेम प्रस्ताव के मामले में भी इतना उदारीकरण आ गया है कि कई बार लड़का-लड़की एक-दूसरे को प्रस्ताव देकर सीधे जवाब पूछ लेते हैं। इंस्टेंट। सामने वाला इंट्रेस्टेड होता है तो फौरन हां कहता है। नहीं तो ‘आई एम ऑलरेडी एंगेज्ड’ बोलकर कट लेता है। आजकर इंकार पर न तो प्रस्तावक बुरा मानता है और ना प्रस्ताव ग्रहणक।

वैलेंटाइंस पीढ़ी पुराने प्रेमियों के इस दर्द को भी नहीं समझ सकती कि बिना प्रेमी-प्रेमिका की तस्वीर के प्रेम में डूबे रहना कितना कठिन होता है। बिना तस्वीर के बहुत रूहानी टाइप इश्क हो लेता था। मोबाइल ही नहीं थे तो मोबाइल कैमरे कहां से होंगे। कैमरा ले जाकर स्कल-कॉलेज में अपनी सो-कॉल्ड प्रेमिका की फोटो खींचना उतना ही मुश्किल था, जितना वेंकटेश प्रसाद के लिए छक्का मारना।

हमारे जमाने में लड़की के इंकार के बाद हर महीने शहर में चार-छह मजनुओं का जन्म होता था। आजकल शांति से ब्रेकअप हो जाता है। हद ये कि कई युवा ब्रेकअप पार्टी भी करते हैं। हमारे जमाने में प्रेम एक चुनौती थी। प्रेम को परवान चढ़ाते वक्त एक पार्टी का दूसरी पार्टी को संदेश भिजवाना ही मिसाइल को टारगेट तक पहुंचाने जैसा मुश्किल था। किस्मत से मामला सैट हो जाए तो भी महबूब के साथ सुकूं के दो पल बिताने की कोई जगह नहीं थी। वो सोशल मीडिया का जमाना नहीं था, इसलिए लोग ज्यादा सोशल थे। शहर में लोग एक-दूसरे को न केवल जानते-पहचानते थे बल्कि किसी के लड़के या लड़की को विपरीतलिंगी के साथ देखकर सेवाभाव से घर पहुंचकर शिकायत करना सामाजिक जिम्मेदारी समझते थे। शिकायत के बाद लड़के की ठुकाई को पिताजी अपना धर्म समझते थे।

आज यकीनन प्रेम का स्वर्णकाल है। लेकिन इस स्वर्णकाल में भी लड़की के इंकार के बाद एसिड फेंकने और दुष्कर्म करने की खबरें पढ़ने में आती हैं तो संत वैलेंटाइन की कसम मन करता है ऐसे आशिकों पर सरेआम कोई व्यंग्य लिख दूं।

- पीयूष पाण्डेय
साभारः नई दुनिया