निजी क्षेत्रों की पहल से ही खेलों के स्तर में होगा सुधार

अभी हाल ही में मैंने भारतीय हॉकी महासंघ के अध्यक्ष के रूप में पदभार संभाला है। मैं हॉकी की आन बान शान और पुरातन गौरव को पुनः स्थापित करने के लिए लगातार प्रयासरत हूं। हालांकि हॉकी की वर्तमान स्थिति को अलग करके मापा नहीं जा सकता, यह  मुद्दा अपने आप में काफी संवेदनशील है। भारत में खेलों को लेकर जबरदस्त उत्साह और संभावनाएं हैं, इसको परिपक्व करने की जिम्मेदारी हमारी है, ताकि विश्व खेल मंचों पर भारत के खिलाडी अपनी बेहतरीन प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। आज जरुरत है कि हम दुनिया के दूसरे देशों की तरफ भी देखें। और खेल जगत में हो रहे बदलावों को अच्छी तरह से जाने और उसके आधार पर एक रचनात्मक मॉडल को अपनाएं। आज जरूरत है कि देशभर में खेल संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए सबल आर्थिक ढांचे का निर्माण अतिआवश्यक है। इसके लिए हम अपना समग्र दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है।

भारत में 9वें एशियाई खेलों से पहले 1982 में पहला खेल विभाग गठित किया गया। भारत की प्रथम राष्ट्रीय खेल नीति सन 1984 में बनायी गयी। साथ ही भारत सरकार द्वारा 1984 में भारतीय खेल प्राधिकरण का भी गठन किया गया। प्राधिकरण का मुख्य कार्य देशभर में खेल प्रतिभाओं को खोजना था। जिससे प्रतिभावान खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देकर निखारा जा सके। लेकिन यह बेहद चिंताजनक बात है कि लगभग तीन दशक बीतने के बाद भी हम अभी तक बहुत कुछ हासिल नहीं कर पाए हैं। यदि हम 2012 में हुए लंदन ओलिंपिक पर नज़र डालें तो हमारी स्थिति अच्छी नहीं दिखतीजहां चीन ने 38 स्वर्ण पदक जीते वहीँ हम एक भी स्वर्ण पदक हासिल नहीं कर सके।

एक राष्ट्र के रूप में आज भी हम खेलों को वो दर्जा हासिल नहीं कर पाएं हैं, जिसके हम हकदार हैं। शारीरिक शिक्षा को स्कूलीं पाठ्यक्रम में शामिल तो कर लिया गया है। लेकिन स्कूलों में खेल के विकास से लिए गंभीरता से प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। जरूरत है कि शारीरिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में अन्य विषयों की तरह ही शामिल किया जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में दुनिया भर के स्कूलों के शारीरिक शिक्षा के स्तर दिखाया गया है। इसके अनुसार “कई भारतीय स्कूलों में योग्य शिक्षकों और सुविधाओं की कमी है, जहां अपर्याप्त निरीक्षण, शारीरिक शिक्षा को केवल मनोरंजन के रूप में देखा जाता है, इसे  शैक्षणिक विषयों के मुकाबले कम महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। साथ ही कई स्कूलों में तो शारीरिक शिक्षा के विषय को पाठ्यक्रम में शामिल ही नही किया है।" सरकार भी खेलों को पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं देती, आज भी कई अभिभावक खेलों को अपने बच्चो के लिए एक बेहतर करियर के रूप में नहीं देखते। यही कारण है कि हमारे देश में बेहतर खिलाड़ियों का अभाव है। और प्रतिभावान खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पाता है । 

क्रिकेट, बैडमिंटन और हॉकी जैसे खेलों में लीग प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, जरुरत है कि इस प्रणाली को बाकी खेलों में इस्तेमाल किया जाए। आने वाले समय में इससे हमारे पेशेवर खिलाड़ियों को बेहतर अवसर और उन्हें आर्थिक स्थिरता मिलेगी। जब तक अन्य खेलों में प्रोत्साहन, सम्मान और आर्थिक संभावनाएं प्रबल नहीं होती तब तक कोई खिलाड़ी इन खेलों के प्रति आकर्षित नहीं होगा। और न ही कोई अभिभावक अपने बच्चों को एथलीट बनने के लिए प्रेरित करेगा। हमें अपने खिलाड़ियों को वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करनी ही होगी। 

हमें ऐसी नीतियों का निर्माण करने की जरुरत है, जिससे खेलों को सम्मानित मुकाम हासिल हो सके। खेल केवल मनोरंजन तक ही सीमित न हो, बल्कि यह एक करियर के तौर पर भी अपनाया जाए। अगर हम चाहते हैं कि खेल की दुनिया में देश की अमिट पहचान बने तो इसके लिए हमें खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। और उसके विकास के लिए लगातार प्रयास करने होंगे। क्रिकेट के महान खिलाड़ी और मेरे साथी सांसद सचिन तेंदुलकर ने देश में खेलों के स्तर को सुधार के लिए तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री को एक पत्र लिखकर कुछ उपाए सुझाए थे। हालांकि तेंदुलकर के सुझावों की खुब तारीफ खुब हुईं, पर उनकी प्रस्तावित योजना पर शायद अब तक कोई अमल नहीं हुआ है। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने शारीरिक शिक्षा को सभी स्कूलों में एक विषय के रूप में मान्यता तो दे रखी है परन्तु आज भी केवल कुछ ही छात्र इस विषय को चुनते हैं।

हमें खेलों के विकास के लिए एकजुट होकर प्रयास करना होगा। हमारे देश में खेलों के गिरते स्तर को देखते हुए मजबूती से प्रयास करने की जरुरत है। इसके लिए सरकार को निजी, गैर सरकारी, सामुदायिक संगठनों के साथ मिलकर काम करने की जरुरत है, इस सहयोग की नीति को हमें अपने देश की राष्ट्रीय खेल नीति में शामिल करना देश के दूर दराज वाले इलाकों से खेल प्रतिभाओं को खोजकर सामने लाना हो, जिससे उन्हें तराशा जा सके।

निजी संस्थाओं द्वारा शोध और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए छात्रवृति एवं वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, ठीक उसी प्रकार क्या हम भी खिलाडियों को आर्थिक मदद और प्रोतसाहन उपलब्ध नही करा सकते? यदि हम इंग्लैण्ड से प्रेरणा ले तो आज भी वहां सरकारी अनुदान उतना अधिक नही है जितना निजी क्षेत्रों द्वारा खेलों को प्रोत्साहन दिया जाता है। उदाहरण के लिए, एक फास्ट-फ़ूड की दिग्गज कम्पनी और एक कुड़ा करकट का निस्तारण करने वाली  कम्पनी खेलों के विकास के लिए एक बड़ी राशि अनुदान के रूप में प्रदान करती है। साथ ही अगर हम अमेरिका की ओलिम्पिक समिति पर नज़र डालें तो आज भी इसे सरकार की ओर से कोई मदद या वित्तीय सहायता नही मिलती है। 2012 में आई एक वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है कि इस वर्ष अमेरिकी खेलों को 650,000 की वार्षिक निधि केवल वहां की जनता के द्वारा योगदान स्वरूप दी गयी थी। यह धन राशि निजी  दान योजनाओं के माध्यम से एकत्रित की जाती है, जो दानदाताओं को उपहार स्वरूप खेल कार्यक्रम की टिकटों के रूप में लौटा दी जाती है। भारत में खेलों की स्थिति को देखते  हुए साफ़ तौर पर कहा जा सकता है, कि भारत में इस कार्यक्रम को पूरी तरह अपनाया नही जा सकता है पर इससे सीख जरुर ली जा सकती है।

मलेशिया के खेल मंत्रालय के अनुसार "कारपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी" (सीएसआर), की पहल से देश में फुटबाल को बढ़ावा मिलेगा। नई कम्पनी एक्ट 2013 अधिनियम के अनुसार बड़े उद्योगों को अपने लाभ का 2 फीसदी हिस्सा सीएसआर गतिविधियों पर खर्च करना है, निजी क्षेत्र की इस पहल से खेलों की स्थिति में सुधारने में मददगार होगा ।

हमें यह उम्मीद हैं कि भविष्य में खेलों की स्थिति बेहतर होगी, क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों पर भी ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए हमारी सरकार की ओर से नई खेल नीति के जरिए अन्य खेलों के विकास और प्रोत्साहन में सफलतापूर्ण सहयोग करेगी।

 

- केडी सिंह ( लेखक राज्यसभा के सांसद व भारतीय हॉकी महासंघ के अध्यक्ष हैं)