मुश्किल भरे यूपीए-2 के दो साल

यूपीए सरकार के सात साल और यूपीए-2 के दो साल पूरे हो गए। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी यह सरकार यूपीए प्रथम की तुलना में ज्यादा स्थिर मानी जा रही थी। एक तो कांग्रेस का बहुमत बेहतर था। दूसरे इसमें वामपंथी मित्र नहीं थे, जो सरकार के लिए किसी भी विपक्ष से ज्यादा बड़े विरोधी साबित हो रहे थे। यूपीए के लिए इससे भी ज्यादा बड़ा संतोष इस बात पर था कि एनडीए की न सिर्फ ताकत घटी, उसमें शामिल दलों की संख्या भी घटी। मुख्य विपक्षी दल भाजपा का नेतृत्व बदला। उसके भीतर की कलह सामने आई। पर यूपीए के पिछले दो साल की उपलब्धियाँ देखें तो खुश होने की वजह नज़र नहीं आती।

जिस वक्त यूपीए-दो की सरकार बनी उस वक्त दुनिया मंदी के दौर से गुज़र रही थी। अमेरिका और चीन की सरकारों ने उद्योगों को बचाने के लिए बड़ी पूँजी झोंक दी थी। यूरोप का बैंकिंग-व्यवसाय टूटने के कगार पर था। मंदी की छाया हालांकि भारत पर उतनी गहरी नहीं थी। पर असर तो था। भारत ने न सिर्फ उस संकट का सामना किया बल्कि विकास की गति एक साल के भीतर फिर से वापस पटरी पर आ गई। हमारे सारे सूचकांक उम्मीदों से भरे हैं। करीब सवा तीन सौ अरब डॉलर का विशाल विदेशी मुद्रा भंडार हमारे पास है। रूस, फ्रांस, इंग्लैंड, जापान और चीन के साथ नए व्यापार समझौते हुए हैं। सभी प्रमुख देशों के नेता भारत की यात्रा पर आ चुके हैं।

यूपीए-दो की पहली वर्षगांठ पर इन दिनों देश उत्साह से भरा था। अपनी प्रगति को शोकेस करने के लिए हमने कॉमनवैल्थ गेम्स अपने यहाँ आयोजित किए थे। हम उम्मीद करते थे कि अब आने वाले वर्षों में ओलिम्पिक खेलों की मेजबानी भी करेंगे। इस शोकेस ने यूपीए-दो की शक्ल बिगाड़ दी। एक के बाद घोटालों की कथाएं सामने आतीं गईं। हमारे तकनीकी, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की धज्जियाँ उड़ती नज़र आ रहीं हैं।

हमारी विकास यात्रा का सबसे ऊँचा झंडा टेली कम्युनिकेशंस के नाम से था। पर हमने जिस तरह से इस काम को आगे बढ़ाया उसकी पोल-पट्टी खुली तो सब स्तब्ध रह गए। आदर्श सोसाइटी के नाम पर हुए घोटाले के बाद सेना के अंदर की बातें भी बाहर आईं। अभी स्विस बैंकों में जमा काले धन का सवाल उठ ही रहा है। उसके प्रेत अभी बाहर नहीं आए हैं। पर हसन अली की सम्पदा को लेकर जो जानकारियाँ सामने आईं उनके कारण देश की राजनैतिक व्यवस्था पर जनता का भरोसा उठता जा रहा है।

यूपीए-दो के लिए उसकी दूसरी वर्षगांठ अच्छा संदेश लेकर नहीं आई है। तमिलनाडु में डीएमके की पराजय परेशानी का संदेश लेकर आई है। सरकार खतरे से बाहर ज़रूर है, पर कुछ खतरे दूर से दिखाई पड़ रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा आंध्र से है, जहाँ जगनमोहन रेड्डी के समर्थक सासंद अब ब्लैक मेलिंग की स्थिति में हैं। आंध्र प्रदेश की विधान सभा का गणित भी किसी वक्त बदल सकता है। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बन ज़रूर गई है, पर राजनैतिक दृष्टि से वह कितनी सफल होगी कहना मुश्किल है।

हालांकि पिछले साल एनडीए ने बिहार का चुनाव जीता था, पर देश के शेष भागों में उसकी दशा अच्छी नहीं थी। यूपीए के सामने भी विश्वास का संकट खड़ा होने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा शून्य बनने का खतरा खड़ा है। अचानक क्षेत्रीय पार्टियों की ताकत बढ़ती नज़र आ रही है। असम में एआईयूडीएफ, तमिलनाडु में डीएमडीके और केरल में मुस्लिम लीग अचानक काफी बड़ी पार्टियों की शक्ल में उभरी हैं।

क्षेत्रीय पार्टियों का उभरना एक तथ्य है। राष्ट्रीय राजनीति का अगला दौर शुरू हो रहा है। सबसे बड़ा संकट अच्छे कद वाले राष्ट्रीय नेताओं का है। तकरीबन सारी पार्टियाँ इसकी शिकार हैं। इन पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं है। क्षेत्रीय पार्टियाँ पहले से इसकी शिकार हैं। पिछले साल के जितने घोटाले हैं उनमें से ज्यादातर राजनेताओं, ब्यूरोक्रेटों और बिजनेसमैनों की मिलीभगत से हुए हैं। कमज़ोर राजनेताओं के कारण राष्ट्रीय व्यवस्था स्वार्थी तत्वों के सामने घुटने टेक रही है। दूसरी ओर ताकतवर क्षेत्रीय नेताओं का उदय उसे मजबूर बना रहा है।

तीन महीने पहले टीवी सम्पादक-सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने कहा था कि हम बिगड़े हालात को काबू में कर लेंगे। उन्होंने राजनैतिक व्यवस्था की मज़बूरियों की ओर इशारा भी किया था। यह मजबूरियाँ कम नहीं होने वालीं। राजनैतिक शक्ति का ह्रास स्वार्थी तत्वों को खेलने का मौका देता है। साफ नज़र आता है कि सत्ता का केन्द्र  कमज़ोर है। हर काम के लिए ग्रुप ऑफ मिनिस्टर हैं। जिम्मेदारी के साथ कोई भी कुछ बात कहने में समर्थ नहीं है। आए दिन व्यवस्था का मज़ाक बनता दिखाई पड़ता है। कुछ नहीं तो  पाकिस्तान को सौंपी गई मोस्ट वांटेड सूची मज़ाक बन गई।

- स्निग्धा द्विवेदी