सामाजिक बदलाव की पहचान

एक समय अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपनी बेटी मसाबा की बिन ब्याही मां बनकर विवाह की अनिवार्यता के खिलाफ आवाज उठाई थी। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब सुप्रीम कोर्ट ऐसी सभी मांओं को बच्चे की कस्टडी का कानूनी अधिकार दे देगा।
 
बीते सोमवार को आए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सामाजिक बदलाव की धीमी गति पर यकीन रखने वालों को एक झटका जरूर लगा होगा। लेकिन आज नहीं तो कल, वे जरूर समझ जाएंगे कि दुनिया हमेशा पुराने, जर्जर मूल्यों की पूंछ पकड़ कर आगे नहीं बढ़ती। भारत में लंबे समय से चली आ रही पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था ने बच्चों को पुरुष की संपत्ति बना रखा था, भले ही वह पिता का दायित्व निभाने को तैयार हो या नहीं।
 
ऐसे में मां की ममता की तो बात ही छोड़िए, उसके आत्मसम्मान तक की बात कोई नहीं सोचता था। हालत यह थी कि दि गार्डियन ऐंड वार्ड्स ऐक्ट और हिंदू माइनॉरिटी ऐंड गार्जियनशिप ऐक्ट में एक प्रावधान यह भी था कि बच्चे का लीगल गार्जियन पिता की सहमति से ही तय किया जा सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बच्चे से सरोकार न रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है नाबालिग बच्चे का कल्याण।
 
अच्छी बात यह है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से अपना पहला आदेश वापस लेने को कहा है। दिल्ली की एक मां को निचले कोर्ट के बाद 2011 में हाई कोर्ट से भी निराशा ही हाथ लगी थी। इसके बाद उसे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना पड़ा। यह मां अपने बच्चे के जैविक पिता का नाम उसके साथ नहीं जोड़ना चाहती।
 
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब कोई भी सिंगल पैरंट, भले ही उसकी स्थिति एक अविवाहित मां की ही क्यों न हो, एक हलफनामा देकर अपने बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट हासिल कर सकती है। इस निर्णय का सबसे गौरतलब पहलू यह है कि अब सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बर्थ रजिस्ट्रेशन न होने की वजह से किसी नागरिक को परेशान न होना पड़े।
 
कोर्ट ने जन्म पंजीकरण करना सरकार का कर्तव्य बताया है। मां की ममता को इस निर्णय के जरिए एक बड़ा अर्थ मिला है क्योंकि गैरजिम्मेदार पिता को सार्वजनिक रूप से अधिसूचित किए जाने की जरूरत से अलग कर दिया गया है।
 
साभारः नवभारत टाइम्स