किराना स्टोर बजट से ओपन बजट की ओर

चिदंबरम की ओपन बजट की पहल कामयाब हुई है, अब क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत को धमका नहीं सकतीं

कभी बजट प्रस्तावों को टॉप सीक्रेट रखने का चलन था। वित्त मंत्री महीनों पहले से बजट मामलों पर चुप्पी साध लेते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। आज बजट प्रस्ताव अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बन जाते हैं। देश के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम दुनियां भर के देशों के सामने बजट की बानगी पेश कर रहे हैं। पहले उन्होंने देश को बजट प्रस्तावों की झलक दिखाई। अब वह ग्लोबल मंच पर भारत के आगामी बजट की झलकियां दिखा रहे हैं।

चिदंबरम का कहना है कि इस साल वह वित्तीय घाटे को कम करके 5.3 पर्सेंट पर लाएंगे और वर्ष 2013-14 में इसे 4.8 पर्सेंट तक कर देंगे। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने बजट बनाने में पूरी समझदारी बरती है। वह दुनिया को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि भारत की वित्तीय स्थिति सुधर रही है। देश ने अपनी सभी वित्तीय कमजोरियों पर काबू पा लिया है। लोग इस बात पर भरोसा करें, इसके लिए यह जरूरी था कि बजट प्रस्तावों को आम किया जाए।

डीजल के दामों में वृद्धि

चिदंबरम की ओपन बजट की पहल कामयाब हुई है। अब क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत को धमका नहीं सकतीं। बजट के आगामी लक्ष्यों को आम करके और पहले उठाए गए कई कदमों- जैसे पीएसयू सेल और रेल किरायों तथा डीजल के दामों में वृद्धि करने जैसे कदमों के जरिए चिदंबरम ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को बरकरार रखने का काम किया है। इससे अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों की भारत से अपेक्षाएं बढ़ी हैं।

अरबों डॉलर के निवेश से रूपये को मजबूती मिली है और मुद्रास्फीति को काबू में किया जा रहा है। इसी की वजह से आरबीआई ने ब्याज दरें घटाई हैं, ताकि देश में निवेश का माहौल सुधारे।

सुपर रिच पर ज्यादा टैक्स

चिदंबरम का कहना है कि वह चाहते हैं कि सुपर रिच लोगों को ज्यादा से ज्यादा इनकम टैक्स देना पड़े। हालांकि वह टैक्स की दरों को स्थिर करना चाहते हैं और अनिश्चितता कम करना चाहते हैं, ताकि उत्पादक निवेश को बढ़ावा मिले। चिदंबरम बड़ा टैक्स रिफॉर्म करना चाहते हैं इसके लिए उन्होंने सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों क सामने एक डील की है कि सेंट्रल सेल्स टैक्स को खत्म कर दिया जाए और उसकी जगह यूनिफाइड गुड्स एंड सर्विस टैक्स की शुरूआत हो।

इसके साथ केंद्र और राज्यों के बीच सौदेबाजी के लिए रास्ता खुलेगा। टैक्स की चोरी पकड़ना आसान होगा। उत्पादन और न्रिर्यात को बढ़ावा मिलेगा। बजट प्रस्तावों को आम किए बिना यह सुधार भी संभव नहीं था। आजादी के बाद दशकों तक बजट, टैक्स की दरों में फेरबदल पर केंद्रीत होते थे। पहले से जानकारी होने पर लोग बुद्धिमानी से उन वस्तुओं को खरीद या बेच लेते थे। इसलिए तब बजट को सीक्रेट रखा जाता था। ऐसे बजट को किराना स्टोर बजट कहा जाता है। किराना दुकानदार अपने छोटे फायदे के लिए कीमतों में बढ़ोतरी या कमी कर देते हैं, लेकिन इससे किराना स्टोर की दशा और दिशा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

पहले बजट भाषण में प्रस्तावित सरकारी खर्च का ब्यौरा दिया जाता था, खासकर सालाना खर्च का। फिर संभावित राजस्व की जानकारी दी जाती थी। इस तरह यह साफ कर दिया जाता था कि दोनों में बड़ा अंतर है और इसे ज्यादा नोट छापकर भी पूरा नहीं किया जा सकता। वित्तमंत्री बताते थे कि मैं फलां वजह से निम्नलिखित वस्तुओं पर टैक्स बढ़ा रहा हूं- इसके बाद उन वस्तुओं की सूची होती थी, जिनके दाम बढ़ाए जाते थे। कई बार टैक्स रेट कम भी किए जाते थे, खास तौर से चुनावों से पहले। लेकिन इनके लीक होने पर भी लोग फायदा उठाते थे, इसलिए बजट को सीक्रेट रखा जाता था। सौभाग्य से भारतीय बजट अब घटते-बढ़ते दामों की उधेड़बुन नहीं रह गए हैं, जो कि सिर्फ एक साल के लिए होती थी। कुछ अपवादों को छोड़ कर उत्पादों और सेवाओं के लिए अब सिंगल रेट तय है। एफआरबीएम एक्ट ने लांग टर्म बजटिंग की शुरूआत की है, जो आने वाले सालों के वित्तीय और राजस्व घाटों का भी हिसाब रखता है। बजट सीक्रेसी ब्रिटिश मॉडल है। इससे उलट, अमेरिका में ओपन बजटिंग सिस्टम है।

पहले राष्ट्रपति बजट प्रस्तावों की घोषणा करते हैं और फिर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव बजट का अपना वर्जन पेश करता है। इसके बाद सीनेट तीसरा वर्जन रखती है। इस तरह बजट प्रस्तावों के तीन विकल्पों पर चर्चा की जाती है। इसमें आम आदमी को भी शामिल किया जाता है। आखिर में आम सहमति से बजट मंजूर किया जाता है। ऐसा खुलापन किसी भी लोकतंत्र की खासियत होती है।

कई दशकों से अमेरिकी बजट अनेक सालों के खर्च और राजस्व को नजर में रखकर तैयार किया जा रहा है। लेकिन परंपरागत भारतीय बजट सिगरेट या पोलिएस्टर वगेरह पर टैक्स बढ़ाने तक ही केंद्रीत रहता था। लेकिन अंध आत्मनिर्भरता के उस दौर में विश्व मानचित्र पर भारत कहीं मौजूद नहीं था। देश का सिर्फ एक ही लक्ष्य होता था- आयात को कम करना और व्यापार घाटे को विदेशी सहायता से पूरा करना। लेकिन 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय मंच पर तेजी से उभरने लगा। जीडीपी में आयात और निर्यात का अनुपात 15 से 45 पर्सेंट हो गया। देश समृद्ध हुआ। लेकिन इसका यह मतलब भी था कि बजट बनाते समय सिर्फ भारत की जनता का ही नहीं, बल्कि बाकी दुनिया का भी ध्यान रखा जाए।

पूरे साल बहस

आज खर्च और राजस्व; जिसमें पीएसयू का विनिवेश भी शामिल है- इन मुद्दों पर सालों भर बहस चलती है। टीवी विश्लेषक लगातार ट्रेंड्स और इश्यूज की समीक्षा करते रहते हैं। यह ओपन बजटिंग से बढ़कर है, क्योंकि अब ओपन बजटिंग लगातार चलती रहती है। तरक्की का असली अर्थ यही है। किराना स्टोर बजटिंग बीते समय की बात हो चुकी है।

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स

स्वामीनाथन अय्यर