सिर्फ भत्ते से नहीं बनेगी बात

उत्तर प्रदेश की तरह पंजाब और राजस्थान सरकार ने भी अब बेरोजगारी भत्ता देने की बात की है। हालांकि राजस्थान सरकार ने बेरोजगारी भत्ता योजना की घोषणा डेढ़ साल पहले ही की थी, लेकिन वह इसे लागू अब यानी पहली जुलाई से करेगी। इसके तहत बेरोजगारों को पांच-पांच सौ रुपये और अतिरिक्त योग्यता वाले अभ्यर्थियों को छह सौ रुपये प्रति माह दिए जाएंगे। इधर, पंजाब के वित्तमंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा ने पिछले दिनों राज्य का बजट पेश करते हुए स्नातक बेरोजगारों को एक हजार रुपये प्रतिमाह देने की घोषणा की है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बेरोजगार युवक-युवतियों के लिए यह एक अच्छा फैसला है। इससे उन लोगों को काफी राहत मिलेगी जिनके पास आमदनी का कोई निश्चित साधन नहीं है, लेकिन ध्यान रहे, बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान कुछ दिनों के लिए राहत का काम ही कर सकता है, यह समस्या का स्थायी समाधान कभी नहीं हो सकता। स्थायी समाधान तो एक ही है और वह यह कि देश के सभी राज्यों में रोजगार के साधन विकसित किए जाएं। इस तरह देखें तो राज्यों ने कल्याणकारी शासन होने की दिशा में जरूरी कदम तो उठाए ही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि एक-एक कर देश के अन्य राज्य भी इस दिशा में कदम बढ़ाएंगे। इस नई व्यवस्था के चलते राज्यों पर खर्च का भार भी बढ़ेगा। सरकारों के लिए यह चिंता की बात तो है कि इस बढ़े हुए खर्च का इंतजाम वह कैसे करेंगी, लेकिन बेरोजगारी के शिकार युवाओं को राहत भी मिलेगी। यह प्रावधान उन्हें हताशा के भंवर में फंसने से बचाएगा, जो आर्थिक तंगी के चलते नौकरियों के लिए आवेदन कर पाने तक की स्थिति में नहीं रह जाते हैं। कई बार शिक्षित युवा बेरोजगारी के ही चलते खतरनाक कदम उठाने तक को मजबूर हो जाते हैं। बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था शिक्षित बेरोजगार युवाओं को इन हालात से बचाएगी। इस नजरिये से देखें तो राज्यों के खजाने पर बढ़ा यह भार बहुत भारी नहीं है। फिर भी बुनियादी बात यही है कि ऐसी कोई भी व्यवस्था फौरी राहत ही साबित हो सकती है, स्थायी निदान नहीं। सरकार को सिर्फ फौरी राहत तक की ही बात नहीं सोचनी चाहिए, उसे यह सोचना चाहिए कि इस समस्या का स्थायी निदान कैसे किया जाए। मुश्किल बात यह है कि हमारे देश के मध्यवर्गीय समाज में आम तौर पर रोजगार का मतलब नौकरी समझ लिया गया है। उसमें भी सबसे ज्यादा लोग सबसे पहली तरजीह सरकारी नौकरी को ही देते हैं। जबकि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में सबको सरकारी नौकरी दे पाना किसी भी सरकार के बस की बात नहीं है। इसके लिए सरकार को उन वजहों की ओर देखना चाहिए जिनके नाते लोग रोजगार के दूसरे साधनों में अब रुचि नहीं ले रहे हैं। इसी देश में एक समय था जब नौकरी को लोग अंतिम प्राथमिकता देते थे और सबसे पहली प्राथमिकता खेती को दी जाती थी। कहावत ही रही है-उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी, भीख निदान। आखिर ऐसा क्या हुआ कि खेती आज लोगों की प्राथमिकता सूची में अंतिम स्थान पर चली गई है और नौकरी पहले नंबर पर आ गई? पूरे देश में खेती आज जिस संकट के दौर से गुजर रही है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। किसान जिन चीजों का इस्तेमाल करके अनाज पैदा करता है, वे सभी बहुत महंगी हो चुकी हैं और खुद उसे अपने अनाज का सही मूल्य कभी नहीं मिल पाता। उसकी मेहनत का लाभ हमेशा बिचौलिये उठाते हैं। ऐसी स्थिति में पढ़े-लिखे युवा खेती की तरफ आकर्षित अगर हों भी तो कैसे? बान यानी व्यापार की स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं है कि हर शख्स इसके लिए साहस कर सके। कहने के लिए लाइसेंस-परमिट राज खत्म हो चुके होने के बाद भी छोटे-मोटे व्यापार के लिए कई सरकारी मुलाजिमों को खुश करने की मजबूरी होती है। उनका अपना एक सिस्टम है, जो नीचे से लेकर ऊपर तक बंधा हुआ बताया जाता है और तमाम उत्साही युवा उस सिस्टम को न समझ पाने के ही चलते व्यापार में लड़खड़ा जाते हैं। इस सिस्टम को समझना भी इतनी आसान बात नहीं है, क्योंकि यहां सब कुछ छिपे तौर पर चलता है। यह अलग बात है कि खेल खुला होता है। राज्य और केंद्र सभी सरकारों को चाहिए कि पहले इस खेल को खत्म कराएं। जो काम वैधानिक रूप से होने लायक हैं, उन्हें वैधानिक रूप से करने की अनुमति दें और जो नहीं होने लायक हैं, उन्हें हर तरह से रोक ही दिया जाए। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के चलते देश के युवाओं और उद्यमियों को जितनी हताशा झेलनी पड़ती है, उतनी किसी और बात के कारण नहीं होती है। इसलिए इनसे न केवल युवा वर्ग, बल्कि देश के हर वर्ग को मुक्ति दिलाएं। युवा वर्ग नौकरी का भरोसा छोड़कर अपने उद्यम के लिए खुद आगे बढ़े, इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में भी बदलाव जरूरी है। हालांकि सरकार इसके लिए लगातार कोशिश कर रही है, लेकिन व्यवस्था अब भी व्यावहारिक स्तर तक नहीं आ सकी है। चूंकि देश में तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान भी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, इसलिए सरकार को कुछ ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे वे लोग भी स्वरोजगार की दिशा में अपने कदम बढ़ा सकें, जिन्हें तकनीकी शिक्षा-प्रशिक्षण नहीं मिल सका है। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है युवाओं में ऐसे संस्कार विकसित करना, जिससे वे जोखिम मोल लेने और खुद अपने दम पर कारोबार करने की दिशा में सोच सकें। पूंजी के लिए शिक्षित बेरोजगारों को अपना उद्यम स्थापित करने के लिए ऋण तो सरकार लंबे समय से दे रही है, लेकिन यह पूरी तरह सफल इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग होने लगा। दुरुपयोग न हो इसके लिए सरकार को कुछ व्यवस्थाएं बना देनी चाहिए। सच तो यह है कि अगर स्वरोजगार के लिए लोगों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जाए और इसके लिए उपयुक्त माहौल बना दिया जाए तो शायद बेरोजगारी भत्ता देने की जरूरत ही न रह जाए। यह जरूर है कि इसके लिए सरकारों, सरकारी महकमों और रोजगार चाहने वाले युवाओं सबको थोड़ी कड़ी मेहनत करनी होगी। सरकार को लोगों में यह प्रवृत्ति जगानी होगी और उपयुक्त माहौल बनाना होगा। साथ ही दिए गए ऋण का सदुपयोग सुनिश्चित करने के लिए कारोबार की निगरानी करनी होगी। यह सब वह अपने महकमों के जरिये ही करेगी। रोजगार चाहने वालों को यह तय करना होगा कि वे सफल होने के लिए पूरी मेहनत करेंगे। मेहनत के बगैर किसी तरह जीविका चला लेने का सपना देखना छोड़ना होगा। जब तक ये संकल्प सभी नहीं ले लेते तब तक बेरोजगारी भत्ते जैसी व्यवस्था का भी कोई खास लाभ नहीं होगा। इसके विपरीत अगर सभी इसके सही उपयोग की बात तय कर लें, तो यह युवाओं और देश को आगे ले जाना वाला बड़ा कदम भी साबित हो सकती है।   - निशिकांत ठाकुरः सभार दैनिक जागरण लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं