दिल्ली में व्यवसाय करने की ‘अ’सुगमता

लाइसेंस, परमिट और इंस्पेक्टर राज की बुरी तहर उलझी समस्याओं ने सेवा क्षेत्र के छोटे उद्यमों को परेशान करना जारी रखा है

भारत के दूसरे सबसे बड़े वाणिज्यिक शहर में व्यवसाय करना आसान नहीं है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी में मेरे सहयोगियों और मैं ने दिल्ली में व्यवसाय करने की सुगमता की वास्तविकता को जांचने के लिए गहरा गोता लगाया। हमने पाया कि दिल्ली में सुधार के अधिकांश दावे महज ऊपरी दिखावा हैं। हमारे अध्ययनों से पता चलता है कि पारंपरिक खुदरा सेवाओं के उद्यमों के मामले में लाइसेंस, परमिट और निरीक्षण राज की समस्याएं अभी भी जिद्दी रूप से फैली हुई हैं।

उदाहरण के लिए रेस्तरां क्षेत्र को ही देख लीजिए। दिल्ली में सभी खान पान की जगहों को बोझिल और अक्सर एक दूसरे में उलझे नियमों का सामना करना पड़ता है। एक अल्कोहल सर्व करने वाले रेस्तरां को 11 लाइसेंस प्राप्त करने की आवश्यकता होती है (13 अगर वे रिकॉर्ड किए गए संगीत बजाते हैं और परिसर में लिफ्ट की सुविधा प्रदान करना चाहते हैं) और कानूनी रूप से दुकान खोलने से पहले 57 दस्तावेज जमा करना होता हैं। सरकार और उद्यमों के बीच प्रक्रियात्मक स्पष्टता और कार्यात्मक संचार चैनलों की अनुपस्थिति के कारण ऐसा करना काफी चुनौतीपूर्ण है। आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 2.1% योगदान देने के बावजूद, भारतीय खाद्य सेवा बाजार का 66% हिस्सा जिसमें रेस्तरां, कैफे, बार और सड़क कियोस्क स्टाल्स आदि शामिल हैं, असंगठित रहता है।

हमारी शोध टीम ने पाया कि आधिकारिक रूप से निर्धारित समय से सभी लाइसेंस प्राप्त करने में 120 से 150 दिन लगते हैं, और इसकी औपचारिक लागत 18,000 रूपए से लगभग 2 लाख रूपए तक होती है। हमारे सर्वेक्षण में सभी उत्तरदाताओं में से आधे से अधिक ने सभी लाइसेंस हासिल करने की इस प्रक्रिया का पालन करने को मुश्किल या बहुत मुश्किल बताया। एक्साइज़ लाइसेंस हासिल करने को उत्तरदाताओं द्वारा सबसे कठिन बताया गया जिसका खर्च रेस्त्रांओं के लिए प्रतिवर्ष 7.64 लाख रूपए से 18.52 लाख रूपए के बीच पड़ता है।

यहां तक कि अगर रेस्त्रां संचालक रेस्त्रां खोलने के लिए आवश्यक सभी लाइसेंस को हासिल करने में सफल भी हो जाता है तो व उन नियमों में आए दिन होने वाले बदलावों को लेकर त्रस्त रहता है। रेस्टोरेंट लगातार और अनियमित सरकारी आदेशों का सामना करते हैं जो उनके परिचालनों को सीधे और प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, मई 2018 में, दिल्ली में उत्पाद शुल्क विभाग ने शराब परोसने वाले रेस्त्राओं में "तेज ध्वनि के कारण समस्या पैदा करने" के नाम पर रिकॉर्डेड संगीत बजाने पर रोक लगा दी। एक अन्य उदाहरण में, नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) ने दिसंबर 2017 में कनॉट प्लेस में दुर्घटना के बाद रेस्तरां और बार द्वारा छत के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था।

इसी तरह, आइए मांस प्रोसेसर और खुदरा विक्रेताओं की समस्याओं पर विचार करें। पशुधन क्षेत्र भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 4.1% योगदान देता है। हमारे अध्ययन में पता चलता है कि दिल्ली में, मांस के उत्पादन और आपूर्ति के आस-पास एक विचारहीन नियामक ढांचे ने नियमों के दायरे से बाहर जानवरों की हत्या और बिक्री को जन्म दिया है।

एनडीएमसी राज्य में वधशालाओं (स्लॉटर हाऊस) को नियमित भी करता है और संचालित भी करता है। राज्य में केवल एक ही वधशाला (गाजीपुर) ऐसा है जिसके पास भैंस, भेंड़ और बकरी काटने की अनुमति है और उसका स्वामित्व भी एनडीएमसी के पास ही है। सरकारी एकाधिकार के अतिरिक्त निजी और वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए वध कार्य पर लागू होने वाले खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम 2011 ने शहर में मुर्गों के काटे जाने के सभी स्थानों को प्रभावी रूप से अवैध बना दिया है।

नगरपालिका के प्राधिकारी शक्तियों को अलग करने के सिद्धांत और निजी वध पर प्रतिबंध लगाने के बेतुकेपन के गंभीर उल्लंघन को पहचानते हैं। प्राधिकारी शहर में 'शांत रहें और आगे बढ़ें' का पालन करते हैं, और इस प्रकार क्षेत्र में सभी उद्यमों का 95% आंशिक अथवा पूरी तरह से गैर लाइसेंसी तरीके से संचालित होता रहता है। लेकिन 'अनौपचारिक नीतियां' वसूली का सुनहरा अवसर प्रदान करती हैं जबकि खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) इन्हें फिर भी गैरकानूनी के तौर पर प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, लाइसेंसधारी 72% लोग दावा करते हैं कि उन्हें लाइसेंस हासिल करने में होने वाले खर्च से अधिक पैसा चुकाना पड़ा है।

इसके अलावा, हम पाते हैं कि सेवा क्षेत्र के उद्यमों के लिए निरीक्षण व्यवस्था में कोई स्पष्ट सुधार नहीं हुआ है। नियमों का भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और उपद्रव प्रचलित है। सर्वेक्षण में शामिल 18% रेस्टॉरेंटर्स ने जांच अधिकारियों के द्वारा जानबूझकर खामियां ढूंढने के इरादे का वर्णन किया, और 30% ने महसूस किया कि अधिकारी केवल अपने हितों को लेकर चिंतित थे। दक्षिण दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) के निरीक्षकों ने वर्ष में एक बार मांस की दुकानों का निरीक्षण करने का दावा किया है, हमारे उद्यम सर्वेक्षण कम से कम 12 गुना अधिक आवृत्ति दर्शाते हैं। हमारे सर्वेक्षण में, मांस की दुकानों में से केवल 2.8% दुकानें ही 80% से अधिक नियमों के अनुपालन के अनुरूप थे।

एक निरीक्षण व्यवस्था को आसानी से सुलभ मार्गदर्शन, सामग्री और चेकलिस्ट जैसे उद्यमों को प्रासंगिक जानकारी प्रदान करके अनुपालन को अधिकतम करना चाहिए। दिल्ली में एक रेस्तरां के संचालन को नियंत्रित करने वाले 12 विभागों में से केवल एक ने एक मार्गदर्शन दस्तावेज प्रकाशित किया है। इसी प्रकार, एसडीएमसी और एफएसएसएआई दोनों के निरीक्षकों ने उल्लेख किया कि मांस की दुकानों के निरीक्षण के दौरान चेकलिस्ट का उपयोग किया जाता है। हालांकि, लगभग 81% उत्तरदाताओं को निरीक्षण कार्य में इस्तेमाल किए गए मानकों की सूचना नहीं थी।

पिछले कुछ वर्षों में, दिल्ली के सरकारी प्राधिकरण- केंद्र, राज्य और नगर पालिका ने पर्याप्त परामर्श के बिना सेवा क्षेत्र के उद्यमों के ईर्द गिर्द तदर्थ नियम बनाए हैं और उद्देश्य के लिए फिट नहीं होने वाले उपकरणों के माध्यम से सामाजिक-सांस्कृतिक चिंताओं को दबाने का प्रयास किया है। व्यवसायी जो एक बार की लागत का भुगतान करते हैं और लाइसेंस प्राप्त करते हैं, उन्हें अस्पष्ट और मनमाने ढंग के निरीक्षण और नियम परिवर्तन को झेलना पड़ता है। ये छोटी और लंबी अवधि की लागत उद्यमियों को अपने व्यापार को बढ़ाने से रोकती है।

विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत ने नाटकीय वृद्धि देखी है। लेकिन यह तरीका भी छोटे उद्यमों को लाइसेंस-परमिट-इंस्पेक्टर राज वाली व्यवस्था से संघर्ष करने को छोड़ देता है। यदि यह स्थिति दिल्ली की है, तो भारत के बाकी हिस्सों में छोटे उद्यमियों के लिए व्यवसाय करने की कठिनाइयों की आप कल्पना भर कर सकते हैं। नियमन की मौजूदा प्रथाओं और ओईसीडी के सर्वोत्तम अभ्यास मानकों के बीच का फर्क, स्थानीय, राज्य और केंद्र सरकारों के मिलन बिंदुओं पर विशेष रूप से लाइसेंसिंग और निरीक्षण नियमों पर पुनर्विचार और पुन: प्रयास करने की आवश्यकता दर्शाती है।

व्यवसाय करने में आसानी के पीछे विचार यह है कि यदि मानव जाति को प्रगति करनी है तो सबसे पहले हम इस बात को मान लें कि आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में टाल मटोल नहीं किया जा सकता है। व्यवसाय करने की सुगमता को महज एक कार्यक्रम के तौर पर देखने वाले दृष्टिकोण और केवल बड़े व्यवसायों की राह आसान करने, बजाय कि इसे एक सिद्धांत के तौर पर अपनाकर हम अपना बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं।

- भुवना आनंद (सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के साथ एक शोध सलाहकार है)

फोटोः रेडिफमेल से साभार (प्रतीकात्मक चित्र)

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