भ्रष्टाचार सूचकांक में लुढ़का भारत

भारत में भ्रष्टाचार का बढ़ना न केवल एक बड़ी चिंता की बात, बल्कि एक ऎसा पक्ष है, जिस पर ज्यादातर भारतीयों को शर्म का अहसास हो रहा है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि भारत में पारदर्शिता और कम हो गई है। भारत वर्ष 2007 में 72वें स्थान पर था, लेकिन अब घटती पारदर्शिता की वजह से 95वें स्थान पर आ गया है।

भारत की छवि खराब करने के मामले में कॉमनवेल्थ घोटाले, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले और काले धन की वापसी पर केन्द्र सरकार की नानुकुर की सबसे अहम भूमिका रही है। बड़े उद्योगपति भी लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता जताते आ रहे हैं, लेकिन सरकार बहुत चिंतित नजर नहीं आती। लोकपाल के मसले को ही लें, तो संसद के विगत सत्र में बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं, लेकिन जिस तरह का लोकपाल बनाया जा रहा है, लगता है, वह व्यवस्था के मकड़जाल में उलझकर रह जाएगा। दूसरी बात, काले धन का मसला सबके सामने है, सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद उन लोगों के नाम बताने में हिचक रही है, जिन्होंने विदेशी बैंकों में काली कमाई जमा कर रखी है।

दो टूक कहना चाहिए कि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट सरकार को आईना दिखाने के लिए काफी है। सरकार विकास के लाख दावे कर ले, भ्रष्टाचार तो विकास के फायदों पर पानी फेरने में लगा है और रही-सही कसर महंगाई पूरी कर दे रही है। पारदर्शिता और घटी, तो देश जहां का तहां खड़ा नहीं रहेगा, बल्कि पिछड़ता चला जाएगा। शायद सरकार को पता नहीं है कि भ्रष्टाचार से देश की कितनी बदनामी होती है, कैसे देश को चौतरफा नुकसान होता है। पहला नुकसान तो यह कि देश में जनता का विश्वास कम होता है, इसका नुकसान पूरी व्यवस्था को पहुंचता।

दूसरा नुकसान, नए निवेश बाघित होते हैं, खासकर विदेशी कंपनियां अपनी परियोजनाओं को चीन जैसे देशों में स्थानांतरित करने के बारे में सोचने लगती हैं। यह देखा गया है कि अच्छे औद्योगिक-व्यावसायिक उपक्रमों को प्रशासकीय कड़ाई तो मंजूर है, लेकिन भ्रष्टाचार मंजूर नहीं। तीसरा बड़ा नुकसान यह है कि देश पहले की तुलना में ज्यादा असुरक्षित होगा, क्योंकि कई लोग भ्रष्ट होने और गलत ताकतों के हाथों बिकने को प्रेरित होंगे। चौथा बड़ा नुकसान यह है कि शासन-प्रशासन मुश्किल हो जाएगा। हिंसा बढ़ेगी। अत: सरकार को ईमानदारी के साथ पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। देश के न्यायपूर्ण विकास का इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को गंभीरता से लेना चाहिए, यह महज मजाक या आंकड़ेबाजी का विषय नहीं है।

 साभार: राजस्थान पत्रिका

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.