कठोर फैसलों का वक़्त

कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन अंततः मार डाला गया. आतंक की एक इबारत का समापन हुआ लेकिन तमाम संदेह और कयास अभी भी विद्यमान हैं. दुनियां थोड़ी चकित जरूर है लेकिन कहीं एक राहत की आस भी दिख रही है. लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि यदि अमेरिका पूरी दुनियां में कहीं भी छुपे हुए अपने दुश्मनों को ढूंढ़ कर मार सकता है और अपनी धमक कायम कर सकता है तो भारत अपने निर्दोष नागरिकों की हत्याएं चुपचाप क्यों देखता फिर रहा है. पाकिस्तान ने ना जाने कितने भारतीयों को अपनी कायराना हरकतों से मौत की नींद सुला दिया और भारत ने बस केवल वार्ता की बात तक बात सीमित रखी. 1947 से लेकर आज तक पाक के मंसूबों में कोई बदलाव नहीं आया और वह लगातार अपनी निंदित हरकतों को अंजाम देता रहा.

बांग्लादेश के विभाजन में भारत की भूमिका और कारगिल वार में हार के बाद तिलमिलाया पाकिस्तान ये समझ चुका है कि आमने-सामने के युद्ध में भारत से विजय की आस बेकार है तो उसने छद्म युद्ध का रास्ता तेज कर दिया. इससे पहले उसने कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को बढ़ा कर भारत को तोड़ने की कोशिश की जो अब भी जारी है. पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा संसद पर आतंकी हमला करने के पश्चात भी भारत ने पुराना रवैय्या अपनाते हुए केवल युद्ध की धमकी दी और मुंबई पर हुए हमले के बाद भी गुनाहगार आतंकी को बिरयानी खिला कर पाला जा रहा है. वाकई दाद देनी होगी भारत के संयम और धैर्य की जो लगातार पिटने के बाद भी वह कोई सबक लेने को तैयार नहीं. भारतीय नेताओं ने स्वार्थ की पराकाष्ठा पार करते हुए कथित धर्मनिर्पेक्षता का निर्वहन किया और भारत के खिलाफ काम करते रहे. वोट की राजनीति ने दुष्टों को सत्ता दिलाई जिनके लिए राष्ट्र का अर्थ केवल कुर्सी होता है, भले ही देश गर्त में चला जाए.

एक कमजोर, आर्थिक रूप से विपन्न और बदहाल देश पाकिस्तान हमें धमकी देकर कहता है कि यदि हमने उसके इलाके में घुसकर आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की कोशिश की तो वह हमारे ऊपर परमाणु हमला कर देगा. यानि चूहा भी आंतरिक गद्दारों की वजह से इतना बोल पाने की हिम्मत रखने लगा और कुकृत्यों में लिप्त राजनेता और स्वार्थांध राजनीति ने हमे बेबस बना दिया कि हम चुपचाप रहकर सारे दुष्कृत्य देखते रहें, सारे अन्याय सहते रहें.

क्या हम इतने कमजोर हैं कि अपने भाई-बंधुओं पर निरंतर होते हमलों को यूं ही देखते रहें. हमारे सैनिकों का खून पानी बनता रहा और राजनीति मजे लेती रही. धमनियों में क्यों कभी कोई उबाल नहीं आता कि हमारे दुश्मन अपना अंजाम सोच कर दहल उठें. क्यों नहीं हम अपने ऊपर किए आक्रमण का जवाब दे पाते और हर समय कायराना मानवाधिकार और परराष्ट्र नीति की बात करते हैं.

वक्त है विचार का, वक्त है दुश्मनों को उनके किए की सजा देने का. समय की पुकार राजनेताओं को समझनी होगी और नागरिकों की मांग पूरी करने के लिए दृढ़ होना होगा. यदि राजनेता और कुत्सित वृत्ति वाली राजनीति अभी भी नहीं संभली तो देश को खुद ही पहल कर हालात को अपने काबू में करना होगा अन्यथा इनके भरोसे तो शायद हमारे टुकड़े होते जाएंगे और इनका विदेशी एकाउंट भरता रहेगा.

- आर के पांडे