टोल टैक्स का विकल्प क्या

सड़क विकास का जरिया है और इसकी शायद सबसे आरंभिक निशानी भी। कई अध्ययनों ने साबित किया है कि सड़क निर्माण से आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं, रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और आबादी के विभिन्न हिस्सों की गतिशीलता में बढ़ोतरी होती है। हालांकि, भारत में राजकोष की जो स्थिति है, उसके मद्देनजर दो-ढाई दशक पहले सरकारें इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि राजमार्गों का निर्माण अकेले उनके वश में नहीं है। तब 'उपयोक्ता लागत को चुकाएं' का सिद्धांत अपनाया गया और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) प्रचलन में आई। टोल टैक्स उसी का परिणाम है। सड़क बनाने वाली कंपनियां इसे वाहन मालिकों से वसूलती हैं, लेकिन यह तरीका कितना अलोकप्रिय है, उसका प्रमाण महाराष्ट्र में राज ठाकरे के टोल विरोधी आंदोलन को मिला जन समर्थन है।
 
इसी कारण महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का रास्ता रोको आंदोलन शुरू होने के कुछ घंटों के अंदर ही महाराष्ट्र सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई और राज ठाकरे को बातचीत का न्योता भेज दिया, लेकिन इस मुद्दे से जुड़े प्रश्न कहीं ज्यादा गंभीर और राष्ट्रीय महत्व के हैं। प्रश्न है कि देश को सड़कें चाहिए या नहीं और अगर चाहिए तो क्या पीपीपी से अलग कोई व्यावहारिक मॉडल उपलब्ध है? 2012-13 में पीपीपी मॉडल के तहत और सरकारी धन से बने 14,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 9,222 करोड़ रुपए टोल के रूप में वसूले गए। क्या इतनी रकम जुटाने का कोई वैकल्पिक जरिया मौजूद है? यह बात सही है कि टोल नाकों से यात्रियों को परेशानी होती है।
 
फिर टोल टैक्स एवं इसकी अवधि तय करने को लेकर भी कई वाजिब संदेह हैं। कुछ जन संगठनों के मुताबिक ऐसे दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे यह मालूम हो कि सड़क निर्माण पर कितना खर्च आया, निर्धारित अवधि में टोल टैक्स से कितनी उगाही अनुमानित है और उगाही अवधि को किस फॉर्मूले के तहत तय किया गया। दरअसल कुछ समय पहले खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने माना था कि टोल टैक्स की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। नि:संदेह इन बिंदुओं को स्पष्ट किया जाना चाहिए, लेकिन पीपीपी की समूची धारणा और सड़कों का निर्माण ही प्रक्रियागत गड़बडिय़ों से उपजे जन असंतोष की भेंट न चढ़ जाए, इसे सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
 
- अविनाश चंद्र