दुकानदारों ने कहा, खुदरा बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से नहीं पड़ेगा फर्क

विपक्षी दलों ने गुरूवार को खुदरा व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर किसी प्रकार ‘बंद’ कराने में तो सफल रहें लेकिन छोटे दुकानदारों, जिनके हितों की रक्षा के नाम पर यह सब हुआ वे ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उनके व्यवसाय पर कथित हमले का आशंका से अविचलित दिखें। टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में किराना दुकान संचालकों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि वे बेरोजगार हो जाएंगे।

दुकानदार इस बात पर जरूर सहमत दिखें कि बड़े खुदरा दुकानों के खुलने से फर्क पड़ेगा। एनसीआर में “हनी मनी टॉप” नाम से 6 आऊटलेट चलाने वाले स्वाधीन नायक का कहना है कि “ग्राहक अच्छे डील और फैंसी डिस्पले पसंद करते हैं, जहां अधिकांश स्थानीय दुकानदार पिछड़ जाते हैं। चूंकि लोग अब ज्यादा जागरूक हो गए हैं, वे विविधता पसंद करने लगे हैं।”

लेकिन दुकानदार यह भी मानते हैं कि विदेशी खिलाड़ियों को भारतीय तौर तरीकों को अपनाने में दिक्कत होगी। कालकाजी में गुरूनानक स्टोर चलाने वाले सुरेंदर सिंह कहते हैं कि “प्रतिस्पर्धा तो होगी, लेकिन यह खुलने वाले स्टोर्स की संख्या और उनके प्रकार निर्भर करेगा। मुश्किल से दस प्रतिशत अंतर पड़ेगा, जिससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है।”

खुदरा व्यवसायियों को इस बात क भी राहत है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बड़ा प्रारूप भारत में उनके लिए परेशानी का सबब बनेगा। मॉडर्न बाजार के मालिक कुणाल कुमार का कहना है कि “ऐसे स्टोर लगभग 20 हजार वर्ग फीट जितने विशाल होते हैं, जो यहां रियल स्टेट के परिदृश्य के अनुकूल नहीं है। किराए के रूप में उन्हें बहुत ज्यादा खर्च तो करना पड़ेगा, रखरखाव, भंडारण, बिजली का बिल अलग से। इस प्रकार उनके लिए लंबे समय तक कम कीमत के ऑफर जारी रखना मुश्किल होगा।” कुणाल के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय उपभोक्ता को डील करना भी सीखना होगा, और कानून तो है ही।

डिफेंस कॉलोनी में “टेस्ट” के मालिक जिम्मी वाधवा का मानना है कि रिटेलर्स ज्यादतर मॉल्स या शहर से बाहर ही होते हैं। “किसके पास इतना समय, पेट्रोल और पार्किंग शुल्क है जो दैनिक उपभोग (परचून) की वस्तुओं की खरीददारी के लिए उतनी दूर जाएंगे।”

दुकानदारों का यह भी मानना है कि भारतीय उपभोक्ताओं और खानपान की संस्कृति को समझना भी बहुत जरूरी है। कुमार के मुताबि “चूंकि हमारा भोजन ताजी सब्जियों पर आधारित है इसलिए हम महीने भर की सब्जियां एक साथ नहीं खरदीदते। पश्चिमी देशों के लोगों की तरह हम डिब्बाबंद खाना स्टॉक कर नहीं रखते।”

नायक कहते हैं “यहां घर-घर में परचून की दुकानें हैं, और जो आराम यहां मिलता है उसका मुकाबला बड़े सेटअप नहीं कर सकते। हम होम डिलीवरी करते हैं और नियमित उपभोक्ताओं को छूट भी देते हैं। बहुत सारे लोगों का हमारे यहां मासिक खाता चलता है या वो हमें एडवांस भी देते हैं।”

वाधवा कहते हैं कि “सबकुछ उपभोक्ताओं से संबंध बनाने पर निर्भर करता है। मुझे उनके पसंद नापसंद की जानकारी होती है इसलिए उनकी पसंद के आधार पर मैं उन्हे चीजों की सलाह दे सकता हूं। सैलरी पर काम करने वाले कितने सेल्सपर्सन इमेंटल और ग्रोगोन्जोला के बीच फर्क जानते हैं? यहां ग्राहक अब भी नए नए भोजन की तलाश में रहते हैं और केवल वही दुकान संचालक उनकी मदद कर सकता है जिसे पता हो कि स्टॉक में क्या है?”

गृहणी नेहा कपूर कहती हैं कि वह अपने घर के समीप के परचून की दुकान से गरम मसाले की सारी सामग्री या ताजी मेटो बनाने की पूरे हफ्ते की सारी सामग्री फोन कर मंगा लेती हूं। यह इतना आसान और निजी होता है कि मैं दुकान पर विश्वास करती हं और यहां तक की जब मैं घर पर नही होती तब भी वे सारी सामग्री मेरे घर भिजवा देते हैं और मैं शाम को उन्हें पैसे देती हूं।

साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया
http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Can-live-with-MNC-retailers-Shopkeepers/articleshow/16482210.cms