जेल सुधार का मॉडल

तिहाड़ जेल के अनेक कैदियों को आकर्षक पैकेज पर नौकरी देने का कुछ कंपनियों का फैसला वाकई सुखद है। इसके लिए जेल प्रशासन भी धन्यवाद का पात्र है। उसने यह संकेत देने की कोशिश की है कि जीवन में उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। अपराध के अंधेरे रास्ते पर जाने-अनजाने पहुंच गए व्यक्ति को भी सुधरने और जीवन की मुख्यधारा में लौटने का एक अवसर जरूर मिलता है। अगर वह दृढ़ निश्चय कर ले तो उसकी जिंदगी नई करवट ले सकती है।

तिहाड़ के कैदियों को शिक्षा, योग, स्वास्थ्य, कामकाज और मनोरंजन के जो अवसर उपलब्ध कराए गए हैं, उनका उनके मन-मस्तिष्क पर सकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। अनेक कैदियों ने अध्ययन, पेंटिंग, हस्तकला, और खेल में उल्लेखनीय प्रदर्शन दिए हैं। अब जेल के भीतर प्लेसमेंट की जो सुविधा शुरू की गई है, इसका अनेक कैदी फायदा उठा रहे हैं। गौरतलब है कि यह तिहाड़ में तीसरा प्लेसमेंट था, जिसमें 14 कंपनियों ने जेल में पहुंचकर ऐसे 80 कैदियों को नौकरी का ऑफर लेटर थमाया, जो अगले छह माह के अंदर रिहा होंगे। तीन कैदियों को छह-छह लाख रुपये के वार्षिक पैकेज पर रखा गया है। नौकरी पाने वाले कैदियों में 10 महिलाएं हैं, जिन्हें 2 से 5 लाख रुपये सालाना का पैकेज दिया गया है। इससे पहले 25 फरवरी को 43 कैदियों को और 27 जुलाई को हुए दूसरे प्लेसमेंट में 52 कैदियों को नौकरी दी गई थी। पर इतना बड़ा पैकेज पहली बार दिया गया है।

सवाल है कि कैदियों को नौकरी देने वाली ये कंपनियां प्लेसमेंट के लिए तिहाड़ ही क्यों पहुंचती हैं? क्या इसलिए कि तिहाड़ ने एक ब्रैंड का रूप ले लिया है? क्या देश के छोटे इलाकों की जेलों में ऐसे कैदी नहीं होंगे, जिनमें सुधरने की आकांक्षा होगी और जो बेहतर नौकरी की पात्रता भी रखते होंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि तिहाड़ के कैदियों को रोजगार देकर ये कंपनियां केवल प्रचार पाना चाहती हैं? सरकार से भी सवाल है कि क्या हम तिहाड़ के रूप में जेल सुधारों का एक आदर्श मॉडल खड़ा करके ही संतुष्ट हो जाएंगे या अन्य जेलों को भी वैसा बनाने की कोशिश करेंगे?

सचाई यह है कि देश के अधिकांश जेलों की दशा बेहद खराब है। उनमें क्षमता से ज्यादा कैदी रखे गए हैं। शिक्षा, मनोरंजन की बात तो दूर, उन्हें बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हैं। आए दिन विभिन्न जेलों में अव्यवस्था, कैदियों के बीच मारपीट या उनके भागने तक की खबरें आती रहती हैं। क्या सरकार और निजी क्षेत्र की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे बेरोजगारी का कोई स्थायी समाधान खोजें ताकि कोई अपराध के रास्ते पर बढ़े ही नहीं।

-नवभारत टाइम्स