इस प्रकार बने अलग राज्य, समस्याओं का समाधान नहीं- चेतन भगत

तेलंगाना के गठन के फैसले के साथ हमने जो शुरू किया है, वह इतना  खतरनाक है कि यदि इसे अभी नहीं रोका गया तो हम आने वाले वक्त में बहुत पछताएंगे। धमकाकर नया राज्य बनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश के नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

हम भारतीयों के बारे में एक बड़ी ही अच्छी बात यह है कि हम उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ते। हमें हमेशा लगता है कि जल्दी ही कोई मसीहा आएगा या ऐसा कुछ महान हो जाएगा, जो हमें सारी समस्याओं से मुक्त कर देगा। बॉलीवुड ने इसे और मजबूती से हमारे दिमाग में बिठा दिया है, जहां अंत में हीरो सब कुछ ठीक कर देता है। हमारे पुराणों में भी अद्भुत शक्ति वाली अच्छाई की ताकतें बुराई (राक्षसों) का अंत कर देती हैं। शायद हमारे इसी भोलेपन का यह नतीजा है कि हम में से कई लोगों को लगता है कि आम आदमी की तकलीफों को खत्म करने का ताजा रामबाण समाधान है- एक नए राज्य का निर्माण।

दक्षिण से लेकर पूर्व और उत्तर तक हर किसी को नए राज्य के इस वायरस ने प्रभावित किया है। गौर करें-अच्छे नेता नहीं, नए नेता नहीं, जात-पात के बजाय स्वच्छ प्रशासन के लिए वोट डालने का नया मानदंड भी नहीं और पहचान को लेकर पूर्वग्रहों को खत्म करने की बात भी नहीं। हम इनमें से कुछ भी नहीं करने वाले। हम तो बेरोजगारी, महंगाई, बिजली, पानी, सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी सारी समस्याएं एक जादुई समाधान से दूर करने वाले हैं- वह है एक नया राज्य।

हालांकि तेलंगाना के साथ हमने जो शुरू किया है, वह इतना घिनौना, भयानक और खतरनाक है कि यदि हमने इसे अभी नहीं रोका तो हम आने वाले समय में बहुत पछताएंगे। और यह खतरनाक बात है : बंदूक के दम पर राज्य का निर्माण।

नहीं, नए राज्यों का गठन कोई समस्या नहीं है। सही परिस्थितियों में इससे हमें समस्याएं सुलझाने में बहुत मदद मिल सकती है। समस्या तो धमकाकर नए राज्य बनाने की कोशिश है।

कई तबके ऐसे हैं जो कर्कश आवाजों में खूनखराबा करने या हड़तालें करने की धमकी देकर अपने लिए राज्य काटकर अलग करने की कोशिश में लगे हैं। कमजोर केंद्र और एक ऐसे प्रधानमंत्री के कारण परिस्थिति और भी बिगड़ जाती है, जो ऐसी आवाजों को खामोश करने के लिए कुछ कहता या करता दिखाई नहीं देता। हालांकि यदि हम ऐसे आंदोलनों पर लगाम लगाना चाहते हैं तो ताकत के इस्तेमाल से ऐसा नहीं हो सकेगा। यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये समस्याएं कहां से निकलती हैं और क्या इससे जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए देश के नक्शे में फेरबदल किए बिना कुछ किया जा सकता है।

अचानक इतने सारे नए राज्यों की मांग क्यों? ऐसा लगता है कि नए राज्यों की मांग देश के आर्थिक रूप से पिछड़े इलाकों से आ रही है। सीधा कारण यह है: लोग खराब प्रशासन से आजिज आ गए हैं और  उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि जवाब किससे मांगे या दोष किसे दें। उन्हें एक नए राज्य का विचार फिर चाहे यह गलत ही क्यों न हो, आजमाकर देखने जैसा लगता है। फिर हम भारतीयों में पूर्वग्रह होते हैं जो ऐसे विचार को और ताकत देते हैं। कई भारतीयों को लगता है कि उनका समुदाय या धर्म या जाति दूसरों से बेहतर है। हमें यह भी लगता है कि हमारे समुदाय का नेता होगा तो उसका रवैया अधिक सहानुभूति से भरा होगा।

इसलिए नया राज्य योग्य समाधान दिखाई देता है। इसमें कोई शक नहीं है कि यह अत्यधिक गलत सोच है। क्योंकि कई बार हमारे पूर्वग्रह ही हमारी समस्याओं के कारण होते हैं। यदि हम पूर्वग्रहग्रस्त नहीं होते तो जात-पात के बजाय योग्यता के आधार पर अपना नेता चुनते। हमने ऐसा नहीं किया इसलिए शासन-व्यवस्था की हालत इतनी खराब है। हालांकि यह कटु सत्य हम भारतीयों के गले नहीं उतरता। हम कोई ऐसी बात स्वीकार नहीं करते जिसमें जिम्मेदारी हम पर डाली गई हो। हम यह मानते ही नहीं कि गलती हमारी है।

दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि हताशाजनक परिस्थितियों व पूर्वग्रहों में फंसे हम यह भूल जाते हैं कि नए राज्यों के गठन जैसे छद्म समाधान से कितना नुकसान होता है। क्योंकि समस्याओं से घिरे राज्य को विभाजित करने से ऐसे दो राज्य हो जाते हैं जहां वही समस्याएं होती हैं। स्थानीय नेता नए राज्य को लेकर चाहे कितने ही सुंदर सपने दिखाए, इस विचार में कई खामियां हैं। पहली तो यह कि छोटे राज्यों का केंद्र में कोई प्रभाव नहीं होता। यह तो हमें स्वीकार करना ही होगा कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री की बजाय उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री की दिल्ली में ज्यादा सुनी जाती है। आप छोटे राज्य बन जाइए और अचानक आप पाएंगे कि किसी को आपकी परवाह ही नहीं है।

दूसरी खामी यह है कि इससे पृथकतावादी, लगभग राष्ट्र-विरोधी भावनाएं जन्म लेती हैं, जो देश के लिए नुकसानदायक हैं। ऐसी खबरें हैं कि तेलंगाना में एक वर्ग के लोगों से बाहर जाने को कहा जा रहा है। यदि असम या पश्चिम बंगाल में नए राज्य बने तो हो सकता है वहां खूनखराबा हो। पीढिय़ों से साथ रह रहे लोग रातोंरात प्रतिद्वंद्वी हो जाएंगे। तीसरी आशंका यह है कि हो सकता है निवेशक नए राज्यों से दूर ही रहें, खासतौर पर उन राज्यों से जिनका निर्माण अस्थिरता के बीच हुआ हो। इसका मतलब काम के अवसरों की कमी और नए राज्य के लिए पहले से खराब स्थिति। चौथी दिक्कत यह है कि इससे हमारे भीतरी पूर्वग्रहों की पुष्टि ही होती है।

आज दुनिया हमारी ओर देख रही है कि हम परिपक्वता दिखाकर अपनी समस्याएं सुलझाएं। दूसरी ओर हम हैं कि आपसी मतभेद और एक-दूसरे से नफरत करने के कारण खोज निकालने में लगे हैं। आंध्रप्रदेश अपनेआप में एक अद्भुत राज्य है। इसमें कोई दोमत नहीं कि अन्य किसी राज्य की तरह इसकी अपनी समस्याएं हैं। इसके टुकड़े करके भारत के कई हिस्सों को अस्थिरता में धकेलना और हमारे पूर्वग्रहों को जायज ठहराना कोई बुद्धिमानी भरा समाधान नहीं है।

नए राज्य बनाने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसके पीछे तार्किक कारण होने चाहिए और इसकी प्रक्रिया शांतिपूर्ण और मुद्दों पर आधारित होनी चाहिए। राज्यों के गठन के पीछे पूर्वग्रहों की बजाय प्रशासनिक कारण होने चाहिए। अगले हफ्ते हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं और हम वह राष्ट्रध्वज फहराएंगे जो हम सबका है। इस पृष्ठभूमि में यह याद रखें कि देश की समस्याओं का हल नए राज्यों का गठन नहीं है। इसकी बजाय हमें एक नई मानसिकता की जरूरत है। एक आधुनिक, पूर्वग्रहों से रहित सोचने-समझने वाले भारतीय मन की। क्या न्यू स्टेट (नए राज्य) की मांग की सूची में हम इस नई स्टेट (मानसिक अवस्था) को जोड़ सकते हैं, प्लीज?

 

- चेतन भगत (अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार)

साभारः दैनिक भास्क

पूर्व प्रकाशितः 8 अगस्त, 2013

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