तब भी जीत सकती है टीम अन्ना

टीम अन्ना की छवि धूमिल हो रही है। ऐसा किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल और भूषणों के गैर-गांधीवादी व्यवहार के कारण हुआ है। कांग्रेस व अन्य पार्टियों के नेता इस बात पर चुटकी ले सकते हैं, लेकिन उन्हें यह मुगालता कतई नहीं पालना चाहिए कि भ्रष्टाचार को लेकर जनता का गुस्सा राई भर भी कम पड़ा है। अन्ना हजारे द्वारा आम जन के इस गुस्से को बखूबी उभारकर एक दिशा दे दी गई है, लेकिन इसकी ताकत जनलोकपाल के कहीं आगे तक जाती है। फिलहाल, इससे घटिया आरोप-प्रत्यारोप का दौर खत्म नहीं होगा।

टीम अन्ना की महात्मा गांधी से तुलना ठीक नहीं है। वैसे तो गांधीजी पर भी ढोंग और अस्वीकार्य आचरण के आरोप लगे थे। वे बार-बार यह कहते रहे कि साधनों की पवित्रता भी उतनी ही जरूरी है, जितनी कि साध्य की। इसलिए अंग्रेजों के उत्पीड़न को खत्म करने के लिए हिंसा साधन नहीं हो सकती। यही कारण था कि उन्होंने पहला सत्याग्रह तब समाप्त कर दिया था, जब कुछ आंदोलनकारियों ने चौरी-चौरा में पुलिस स्टेशन को आग लगा दी थी। बाद में गांधीजी ने खुद एलान किया कि हिंसा के जोखिम का हिसाब लगाए बगैर इतने बड़े आंदोलन का निर्णय बहुत बड़ी भूल थी। हालांकि, उन्होंने अगले आंदोलनों में हिंसा की अनदेखी की। भारत छोड़ो आंदोलन इसकी एक मिसाल है। अंग्रेजों ने इसकी यह कहकर तीखी निंदा की कि गांधीजी साधन और साध्य के अपने सिद्धांत को ही भूल गए हैं।

इसी तरह ब्रह्मचर्य को साबित करने के लिए गांधीजी की युवतियों के बगल में सोने की आदत की भी कटु आलोचना हुई, क्योंकि उस दौर में यह नैतिक मूल्यों के खिलाफ था। गरीबी का जीवन अपनाकर उन्होंने संतों का आभामंडल तो हासिल किया, लेकिन सरोजनी नायडू ने इस बात का खुलासा किया था कि गांधीजी की यह गरीबी खासी महंगी पड़ती है। इन सभी घटनाओं के चलते गांधीजी का उपहास किया गया, लेकिन इनसे ना तो उनके आभामंडल में कमी आई और न ही जनता के समर्थन में। यह मान लिया गया कि उनमें भी मानवीय कमजोरियां हैं, मगर वे लोगों के बीच में महात्मा ही रहे। अन्ना हजारे कोई गांधी नहीं हैं और उनके समर्थक भी गांधीजी के अनुयायियों की तुलना में काफी कमजोर हैं। टीम अन्ना के संदिग्ध आचरण के उजागर होने के बावजूद भी उनकी भ्रष्टाचार विरोधी अपील बनी रहेगी। हजारे को गांधीजी की वह बात याद रखनी चाहिए कि सत्याग्रह शुरू करने से पहले आपको अपने तन-मन को स्वच्छ कर लेना चाहिए और दूसरों को सुधारने की कोशिश से पहले स्वयं का सुधार करना चाहिए।

हजारे उन चार मंत्रियों के कथित गिरोह पर जमकर बरसे, जिन्होंने उनकी टीम की छवि को धूमिल करने की कोशिश की। मगर माफ करें, यह नहीं चलेगा। उनके टीम के सदस्यों की छवि ही ऐसी है। उनको कतई निर्दोष नहीं माना जा सकता है। उनका आचरण संदेह के घेरे में है और कई बार तो यह आपराधिक भी नजर आता है। गांधीजी होते तो ऐसी घटनाओं के बाद अपने आंदोलन की शुद्धि के लिए उपवास रख लेते, लेकिन हजारे ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं।

शौर्य पुरस्कार विजेता किरण बेदी को हवाई किरायों पर बड़ी छूट मिलती है, लेकिन वे उन प्रायोजकों से पूरा किराया लेकर बची राशि अपनी जेब में डालती थीं, जो उन्हें तमाम कार्यक्रमों में बुलाते थे। इनमें सरकारी संस्थाएं भी शामिल थीं। कई बार उन्होंने बिजनेस क्लास का पैसा लिया और इकोनॉमी श्रेणी में यात्रा कर पैसा बचाया। निश्चित ही यह धन जुटाने का गलत तरीका था, भले ही यह उनके एनजीओ में जा रहा हो। किरण बेदी कहती हैं कि वे खुद पैसे का लेनदेन नहीं करतीं और यह बचाई गई रकम सीधे ट्रैवेल एजेंट से उनके एनजीओ में चली जाती है। सच पूछिए तो यह बेहद कमजोर बचाव है। नरसिम्हाराव और अमर सिंह ने भी यह दावा किया था कि नोट के बदले वोट के मामले में उन्होंने निजी तौर पर सांसदों की खरीद-फरोख्त नहीं की। लेकिन क्या यह कहने से उनकी छवि साफ हो जाती है? तमाम घोटालेबाज नेता कहते हैं कि उन्होंने पार्टी के लिए धन लिया है, न कि अपने लिए। याद कीजिए, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ए. आर. अंतुले पर भ्रष्टाचार के लिए मुकदमा चलाया गया था, जब तमाम बिल्डरों ने उनके एनजीओ को बड़ी राशि दान में दी थी। अंतुले को बाद में दोषमुक्त करार दिया गया था, क्योंकि लिए गए दान के बदले बिल्डरों का कोई काम करने की बात साबित नहीं हो पाई। लेकिन उनकी छवि जरूर बर्बाद हो गई। किरण ने कहा है कि वे उक्त तरीके से जुटाए गए धन को लौटा देंगी, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। अगर वे दावा करती हैं कि वे गांधीवादी हैं, तो उन्हें अपनी शुद्धि के लिए उपवास करना चाहिए।

टीम अन्ना के दूसरे सदस्य अरविंद केजरीवाल को टीम के ही पूर्व सदस्य स्वामी अग्निवेश ने कटघरे में खड़ा किया है। उनका आरोप है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के लिए जुटाए गए धन को अरविंद ने अपने एनजीओ के खाते में जमा किया है। यदि यह साबित हो जाता है तो यह गबन का मामला है। तब बचाव में यह कहना ठीक नहीं होगा कि उनका खुद का एनजीओ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में हिस्सा ले रहा था। इतना ही नहीं, केजरीवाल ने समय से पहले नौकरी छोड़ दी थी, जबकि शर्तों के मुताबिक उन्होंने सरकार को बांड की 9 लाख रुपये की रकम नहीं चुकाई। उन्हें तो अपना आरटीआइ एजेंडा पूरा करना था। उनका यह सोचना सही हो सकता है कि सरकार उन्हें उनके भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के लिए निशाना बना रही है। फिर भी सवाल तो उठता ही है कि सरकार उनके निजी एजेंडे को पूरा करने के लिए पैसे से भरपाई क्यों करे?

भूषण परिवार सार्वजनिक जीवन में खुद को बड़ा पाक-साफ बता रहा है। इसके लिए उन्हें खूब तारीफ भी मिली है। लेकिन दुख की बात यह कि इस परिवार को नोएडा में दो बेहद शानदार फॉर्म प्लॉट मिले हैं, वह भी बाजार कीमत से कई करोड़ रुपये कम में। नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्हें खुद ही इन प्लाटों को वापस कर देना चाहिए।

अभी यह देखना है कि टीम अन्ना अपने सार्वजनिक आचरण में सुधार करती है या नहीं, लेकिन यह तय है कि इसके लिए लंबे समय तक वे उपहास के पात्र बने रहेंगे। फिर भी इन्हें ऐसे घोटाले समझना भूल होगी, जिनसे टीम अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान खत्म हो जाएगा। उन्होंने जो कुछ भी किया है वह नेताओं के करोड़ों-अरबों के घोटालों की तुलना में कुछ नहीं है।

निश्चित ही यह अच्छा होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़ने वालों की छवि साफ-सुथरी हो। लेकिन उनमें कुछ दोष हैं, तो भी चलेगा। अगर जयललिता अपने पुराने काले कारनामों के साथ भ्रष्ट डीएमके सरकार को वोटरों के जरिए बाहर का रास्ता दिखा सकती हैं, तो साफ है कि भारत में धूमिल छवि वाले आंदोलनकारियों के लिए क्या मुश्किल होगी। मुख्य मुद्दा टीम अन्ना की शुद्धता का नहीं है, बल्कि नेताओं की अशुद्धता का है।

हमें कानून तोड़ने वालों को सबक सिखाने के लिए संस्थागत बदलाव की जरूरत है। लोकपाल विधेयक तो महज एक शुरुआत है। हमें भारत को न्यायपूर्ण बनाने के लिए समूचे पुलिस व न्याय तंत्र में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है।

- स्वामीनाथन अय्यर
साभार: स्वामीनॉमिक्स.ऑर्ग

स्वामीनाथन अय्यर