सरकारी स्कूलों के शिक्षक बस समय जाया करते हैं!

शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा नॉर्थ दिल्ली म्युन्सिपल कॉरपोरेशन के स्कूल में किये गए औचक निरीक्षण में कई शिक्षक अनुपस्थित पाए गए। एक शिक्षक ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी लेकिन वास्तव में वह निरीक्षण के दौरान स्कूल में उपस्थित नहीं था। जो शिक्षक स्कूल में उपस्थित थे वे भी क्लास नहीं ले रहे थे। कुछ शिक्षक जो क्लास ले रहे थे वहां भी छात्रों की उपस्थित कुल दाखिल छात्रों की संख्या के आधे से थोड़ी ही अधिक थी। यह तब है जबकि कोरोना महामारी के कारण स्कूल बंद हैं और कक्षाएं ऑनलाइन चल रही हैं।

निरीक्षण के दौरान छात्रों को दिये जाने वाले गृह कार्य और उसे जांचने में भी अनियमितता पाई गई। यह भी पाया गया कि बड़ी संख्या में छात्रों के कक्षा में अनुपस्थित होने के बावजूद शिक्षकों के द्वारा इस बाबत कोई कदम नहीं उठाया गया। इस बारे में मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक रिसर्च एंड एक्सटेंशन विंग के असिसटेंट डायरेक्टर के द्वारा निरीक्षण के बाद विभाग को जमा रिपोर्ट में कहा गया है स्कूलों में शिक्षक समय बर्बाद कर रहे हैं और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

यह खबर दिल्ली की मीडिया में काफी प्रमुखता से प्रकाशित हुई। लेकिन सरकारी स्कूलों की कार्य पद्धति से अवगत लोगों के लिए यह बात बिल्कुल अचरज पैदा करने वाली नहीं है। दरअसल सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की अकर्मण्यता का मुद्दा अब काफी पुराना हो गया है और इसमें कुछ भी नया नहीं है। यह अब ज्ञात तथ्य है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति औसतन 25 प्रतिशत है। यह आंकड़ा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और वर्ल्ड बैंक द्वारा वर्ष 1998 में देश में कराए गए अध्ययन से प्राप्त हुआ था। यानी यह समस्या अब लगभग ढाई दशक पुरानी हो चुकी है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट तौर पर पाया गया था कि जो शिक्षक स्कूल में उपस्थित थे उनमें लगभग आधे कक्षा में शिक्षण कार्य के इतर जैसे चाय की चुस्की लेना, नाश्ता करना, स्वेटर बुनना अथवा झपकी लेना आदि कार्यों में लगे हुए थे। केंद्र व राज्य सरकारें अपने स्तर पर कक्षाओं में शिक्षकों की अनुपस्थिति वाली बीमारी को दूर करने के लिए वर्षों से लगी हुई हैं लेकिन वे इसमें अबतक सफल नहीं हो सकी हैं।

शिक्षाविद और युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की डा. गीता गांधी किंगडन के मुताबिक समस्या के समाधान के तौर पर जहां शिक्षकों की जवाबदेही तय करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए थे वहीं सरकार ने ऐसा करने की बजाय इस क्षेत्र में और अधिक फंड देने का फैसला किया। शिक्षकों के वेतन में वृद्धि की गई, और अधिक शिक्षकों की भर्ती की गई, अधिक से अधिक सुविधाओं की घोषणा की गई और वे सभी काम किये गए जो इस बड़े वोटबैंक को रिझाने के काम आ सकते थे। डा. किंगडन के मुताबिक संविधान का आर्टिकल 171 (3सी) भी सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में कमी का एक बड़ा कारण है। यह आर्टिकल सरकारी शिक्षकों का राजनीतिकरण करता है और उन्हें राजनैतिक शक्ति प्रदान करने के लिए विशेष अधिकार का प्रावधान करता है। यह आर्टिकल राज्यों के विधान परिषद में शिक्षकों के लिए अनिवार्य भागीदारी को सुनिश्चित करता है। उत्तर प्रदेश में तो 24 प्रतिशत तक क प्रावधान है। इस प्रावधान के कारण राज्यों में शिक्षक लॉबी काफी राजनैतिक रूप से काफी मजबूत है और इनके प्रभाव के कारण शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सख्त और आवश्यक कदम उठाने से राज्य सरकारें बचती रही हैं।

-आजादी.मी