नैतिकता

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के आलोचक कहते हैं कि यह नितांत अनैतिक है क्योंकि यह लालच पर आधारित है। लालच- लाभ कमाने का भद्दा प्रेरक। क्या यह आलोचना वैध है? इस क्यों को समझना जरूरी है क्योंकि जन नैतिकता समाजवाद के कहीं बहुत नीचे दब गयी है। प्रतिदिन घोटाले होते हैं। चोरों (नेताओं) को आर्थिक स्वतंत्रता को अनैतिक कहने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नही है। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नही होता होगा।
 
व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नहीं हैं। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नहीं होता होगा।
 

अंतत: आठ साल चली लंबी लड़ाई के बाद महाराष्ट्र में डांस बार पर पाबंदी खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार पर प्रतिबंध खत्म करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को कायम रख सही फैसला दिया है। इसके पहले भी राज्यपाल ने प्रतिबंध संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। लेकिन राज्य सरकार पाबंदी लागू करने पर अड़ी रही और मध्यवर्ग की 75 हजार से ज्यादा युवतियां बेरोजगार हो गईं। इससे खराब बात तो यह हुई कि सरकार ने कोर्ट और मीडिया में उन पर जो अश्लील आरोप लगाए उनकी वजह से वे कोई दूसरा काम करने लायक नहीं रहीं। सरकार ने डांस बार को ऐसी जगह बताया जहां लोग लड़कियों से

जब से मुक्त अर्थव्यवस्था की शुरूआत हुई है पाठकों के कानों पर बार-बार एडम स्मिथ नामक अर्थशास्त्री का नाम बार-बार पड़ने लगा  है। मराठी साहित्य में जो स्थान ज्ञानेश्वरी का है वही स्थान अर्थशास्त्र में उनके द्वारा 1776 में लिखी गई पुस्तक `राष्ट्र की संपत्ति`(Wealth of Nations) नामक पुस्तक का है। स्मिथ ने श्रम विभाजन, विशेषज्ञता जैसे प्राथमिक सिद्धांतों से लेकर मूल्य, बाजार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, और मुक्त अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर अत्यंत प्रवाहपूर्ण भाषा में और विस्तारपूर्वक उस पुस्तक में अपने विचार प्रगट किए हैं। व यह कहा जा सकता है क

वह अक्टूबर के शुरुआती दिनों की एक खुशनुमा शाम थी। एक मुख्य समाचार चैनल के एंकर अरविंद केजरीवाल के नवीनतम शिकार की करतूतों की व्याख्या करते हुए गला फाड़-फाड़कर लालच पर दोष मढ़ रहे थे। उसी दिन केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से गलत तरीके से सस्ती जमीन लेने के आरोप लगाए थे। अगले ही पल एंकर बताने लगे कि इस पूरी समस्या की जड़ क्रोनी कैपिटलिज्म यानी राजनेताओं की मिलीभगत से चलने वाले व्यावसायिक उपक्रम हैं। हमारे मीडिया में शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब पूंजीवाद की व्याख्या के लिए लालच शब्द का इस्तेमाल न किया जाता हो। वे कहते हैं कि यदि

Author: 
गुरचरण दास

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