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निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है? हमारे लिए यह तय करना जरूरी क्योँ है कि एक गणित के अध्यापक की योग्यता क्या है, जबकि यह जानना जरूरी है कि उसके छात्र गणित में कितने कुशल हो रहे हैं?

Author: 
गुरचरण दास

बजट 2017 पेश करने का समय सिर पर आ गया है और शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्र ऐसे कुछेक क्षेत्रों में शामिल है जिन पर वित्त मंत्री को तुरंत ध्यान देना चाहिए। हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल तहस-नहस हो चुकी है और उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रही। हम जब तक इसे दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक अच्छे दिन लाने की सरकार के तमाम कोशिशें बेकार साबित होंगी। 

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

आजादी के पूर्व से ही देश में शिक्षा के प्रचार प्रसार में बजट प्राइवेट स्कूल्स अर्थात लो फी प्राइवेट स्कूल्स का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। समय समय पर इन स्कूलों से निकली विभूतियों ने व्यापार, खेल, राजनीति सहित तमाम क्षेत्रों में अपने झंडे गाड़े हैं। अफोर्डिब्लिटी और क्वालिटी एजुकेशन के कारण ही आज बजट प्राइवेट स्कूल्स सरकारी स्कूलों के विकल्प के रूप में उभरे हैं। न केवल नौकरी पेशा मध्यम वर्ग बल्कि मेहनत मजदूरी करने वाला निम्न आय वर्ग भी अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए बीपीएस का रूख कर रहे हैं। इस बात की तस्दीक समय समय पर सरकारी और गैर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक स्कूल ने लड़कियों को पढ़ाई छोड़ने से रोकने के लिए एक अनोखी तरक़ीब अपनाई है.
ये स्कूल दिल्ली से क़रीब 125 किलोमीटर दूर बुलंदशहर ज़िले के उप प्रखंड अनूपशहर में स्थित है.
इस स्कूल में छठी कक्षा से ऊपर की हर छात्रा को कक्षा में आने के लिए प्रतिदिन 10 रुपए दिए जाते हैं.

एक बार फिर स्कूल एडमीशन की सरगर्मियां जोरो पर है। इसी बीच स्कूल संगठनों ने यह मांग दोहराई है कि उन्हें मैनेजमेंट कोटा के अंन्तर्गत एडमीशन की छूट दी जाए। पर जिस तरह से मैनेजमेंट सीटों की नीलामी की जाती है, उसे देखते हुए सरकार शायद ही इसे छूट दे। आखिर ऐसा क्यों है कि निजी स्कूल मनमाने पैसे वसूल कर नर्सरी में दाखिला देना चाहते है?