Narendra Modi

हाल ही में लोक सभा में एक बहस के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह टिप्पणी की थी कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सूट-बूट वालों की सरकार चलाते हैं, जो अपने अमीर करीबियोँ का समर्थन करती है और गरीब लोगोँ को नजरअंदाज करती है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री ने लखनऊ में उद्योगपतियों के बीच यह कहा कि वह उनके साथ खड़े होने में डरते नहीं। इसी के साथ उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि देश के विकास में उद्योगपतियों की भी भूमिका है। वैसे तो इस सामान्य सी बात को हर कोई समझता है, लेकिन कुछ लोग इस बुनियादी बात को समझने से इन्कार करने के साथ ही आम जनता को बरगलाने का काम भी कर रहे हैं।

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किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

क़ानून क्या है? इस बारे में ऑस्टिन का कथन है कि क़ानून संप्रभु की आज्ञा है। राज्य के सन्दर्भ में अगर बात करें तो राजतंत्र वाली व्यवस्था में राजा का आदेश ही क़ानून होता था। शासन की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी क़ानून की परिभाषा कमोबेस वही है। सवाल है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में क़ानून लोकहित के लिए हैं या लोकहितों को ही क़ानून के मापदंड पर रखकर देखना होगा?

स्वतंत्रता दिवस का अवसर थोड़ा रुकने, रोजमर्रा की घटनाओं पर सोच का दायरा बढ़ाने और पिछले 68 साल के दौरान अपने देश की यात्र पर नजर डालने का बढ़िया वक्त होता है। आजाद देश के रूप में अपने भ्रमपूर्ण इतिहास पर जब मैं नजर डालता हूं तो कुहासे में मील के तीन पत्थरों को किसी तरह देख पाता हूं। अगस्त 1947 में हमने अपनी राजनीतिक लड़ाई जीती। जुलाई 1991 में आर्थिक आजादी हासिल की और मई 2014 में हमने सम्मान हासिल किया।
 
Author: 
गुरचरण दास

यह अच्छा है कि वर्तमान मोदी सरकार विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए अपने पूर्ववर्ती सरकारों की भांति भावुकता की बजाए व्यावहारिकता के आधार पर फैसले लेती दिख रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली के राज्यसभा में दिया गया वह बयान जिसमें कि उन्होंने घाटे में चल रही 79 सार्वजनिक इकाईयों को निजी करने के विकल्प को खुला रखने की बात कही थी, इसका ज्वलंत प्रमाण है। स्थिति की गंभीरता को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि यदि सिर्फ उक्त 79 इकाईयों में लगे निवेश की धनराशि को ही वसूल लिया जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक को 1,30,000 रुपए प्राप्त हो सकते