Communists

किसी भी शब्द को लेकर समाज में एक ख़ास किस्म की सकारात्मक अथवा नकारात्मक अवधारणा का बन जाना कोई नई बात नही है. 'बाजार' अर्थात 'मार्केट' शब्द  भी इससे अछूता  नही  है। आमतौर  पर  यदि  आप  किसी भी व्यक्ति से  एक सवाल पूछें कि क्या देश में  बाजार के लिए आजाद एवं उदार माहौल होना चाहिए ? अथवा क्या बाजार पर बंदिशों की बजाय छूट का माहौल ज्यादा होना ठीक है ? आपको बहुतायत में जो जवाब मिलेगा वो 'नही' में होगा।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

हाल ही मे जब राज्यों की विधानसभाओं के चुनावी नतीजे सामने आए, तो पश्चिम बंगाल में साम्यवादियों और तमिलनाडु में डीएमके की नाटकीय ढंग से हुई हार को ज़्यादा तवज्जो दी गई। जिन दो राजनेताओं की वजह से जीत मुमकिन हो पाई, उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियों में लोगों ने खूब रुचि ली। केरल का ज़िक्र हुआ ज़रूर, लेकिन जीत के कम अंतर की वजह से, जो सत्ता पर बैठे मुख्यमंत्री की वजह से संभव हो पाई थी। वह मुख्यमंत्री जिन्हें कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक गठबंधन से ज़्यादा अपनी सरकार और दल का कोपभाजन ज़्यादा बनना पड़ा।

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