शिक्षा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल अगले चार महीने में पूरा करने जा रही है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि सरकार इन पांच वर्षों में क्या हासिल करने में सफल रही। सरकार ने कई क्षेत्रों में सुधार पेश किए हैं लेकिन देश भर में स्कूली शिक्षा प्रणालियों में एक बड़ा बदलाव लाने में विफल रही है।

दिल्ली के कम शुल्क वाले बजट स्कूल सरकार से सहयोग की उम्मीद रखते हैं जबकि बदले में उन्हें नियमन संबंधी बाधाएं ही मिलती हैं। स्कूल संचालक सभी नियमों का पालन करना तो चाहते हैं लेकिन दिक्कत उन नियमनों को पूरा करने की कठिन प्रक्रिया है। इस मुद्दे पर दिल्ली के बजट स्कूलों के प्रतिनिधि से विस्तृत बातचीत के कुछ मुख्य अंश.. - आजादी.मी

- अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतियोगिता में ‘ड्रीमर्स ऑफ ब्रेसवाना’ और ‘ब्रिंगिग स्कूल्स वेयर देयर इज नन’ को क्रमशः दूसरी और तीसरी श्रेष्ठ फिल्म का खिताब

- एडुडॉक फेलो वर्ग में विकिरण को श्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म का पुरस्कार

क्या देश की शिक्षा व्यवस्था अबतक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है? क्या ऐसा नीति निर्माताओं की बुरी नीयत का परिणाम है? या यह सेक्टर बुरी नीतियों का परिणाम भुगत रहा है? क्या सुधार के लिए सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयास सही दिशा में जा रहे हैं?? इन सब का जवाब ढूंढने के लिए आइए जानते हैं विशेषज्ञों का क्या मानना है..

आजादी.मी

देश में सभी छात्रों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा आसानी से, पड़ोस में और कम खर्च में प्राप्त हो सके, अफोर्डेबल अर्थात बजट स्कूलों का यही ध्येय है। स्वप्रेरित एडुप्रेन्योर्स (शिक्षा प्रदाता) इसी उद्देश्य से काम करते हैं लेकिन सरकारी तंत्र और नियमन संबंधी बाधाएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं। कम से कम बजट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा का यही मानना है। इस वीडियो में देखिए कुलभूषण शर्मा और क्या क्या आरोप सरकार और सरकारी तंत्र पर लगा रहे हैं.. आजादी.मी

मोदी सरकारी द्वारा नई शिक्षा नीति के मसौदे को तैयार करने के लिए गठित के. कस्तूरीरंगन कमेटी को हाल ही में चौथा विस्तार प्रदान किया गया है। अब इस कमेटी के पास नई शिक्षा नीति से संबंधित फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 दिसंबर तक का समय होगा। इसके पूर्व कमेटी को तीसरा कार्य विस्तार 30 अक्टूबर तक के लिए प्रदान किया गया था। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने सरकार को ‘जीरो ड्रॉफ्ट’ सौंप दिया गया था, लेकिन सरकार की मंशा शायद इसे आम चुनावों तक टालने की ही प्रतीत होती है। खैर..

● स्कूल स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक मौजूदा कठोर नियमोँ को जितनी जल्दी हो सके आसान किया जाना चाहिए
● शिक्षा के क्षेत्र में नव प्रवेशियों के लिए सरकार को ‘स्कूल खोलने और चलाने की सुगमता’ रैंकिंग अभियान की शुरूआत करनी चाहिए और स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना चाहिए

● प्राइवेट स्कूल लर्निंग आउटकम के मामले में सरकारी स्कूलोँ से ज्यादा आगे नहीं हैं
● तो सरकारी स्कूलोँ में होने वाले दाखिलों में गिरावट क्यों देखने को मिल रही है?

वर्ष 2010-11 में, 4,435 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन पर 486 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इन सभी स्कूलोँ में 14,000 शिक्षक अधिक थे। और इन सभी 4,435 स्कूलोँ में पढ़ने वाले बच्चोँ की कुल संख्या करीब शून्य थी।

नए साल में नया संकल्प लेने का वक्त आ गया है। ऐसे में मैं एक नियम में सुधार की बात करूंगी, जो मेरे हिसाब से इस साल के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है और वह है शिक्षा क्षेत्र को स्वतंत्रत किया जाए और स्कूलोँ को लाभ कमाने का अवसर दिया जाए।

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