शिक्षा

आरटीई एक्ट लागू होने के बाद से लगातार सरकारी स्कूलों में नामांकन की संख्या घटी है जबकि नामांकन कराने वाले छात्रों की कुल संख्या में तेजी से ईजाफा हुआ है। पर यदि ऐसा है तो बच्चे जा कहां रहे हैं.. ! जी हां, बच्चे जा रहे हैं निजी स्कूलों, विशेषकर ऐसे स्कूलों में जहां फीस तो न्यूनतम है ही गुणवत्ता भी सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर है। ऐसे में सरकार की फजीहत होना लाजमी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पक्षपाती लिंग चुयन की प्रक्रिया का उन्मूलन, बालिकाओं के अस्तित्व व सुरक्षा को सुनिश्चित करना और उनके लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था करना था। इसके लिए 100 करोड़ रूपए के आरंभिक कोष का प्रावधान भी किया गया। शुरू में इस अभियान के फायदे भी देखने को मिले। सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड हुए ‘सेल्फी विथ डॉटर’ और इसे मिले व्यापक जनसमर्थन ने पिछड़े व ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को भी विश्वास से ओत प्रोत किया। महिलाएं घरों से बाहर निकलने लग

प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है जिसपर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। हाल के वर्षों में भारत ने प्राथमिक शिक्षा में नामांकन, स्कूलों में छात्रों की संख्या बरकरार रखने, उनकी नियमित उपस्थिति दर और साक्षरता के प्रसार के संदर्भ में काफी प्रगति की है। जहाँ उन्नत शिक्षा पद्धति को किसी भी देश के आर्थिक विकास का मुख्य योगदानकर्ता तत्व माना जाता है, वहीं भारत में आधारभूत शिक्षा की गुणवत्ता फिलहाल एक चिंता का विषय है। निजी व सरकारी स्तर पर गुणवत्ता सुधार के लिए काफी प्रयास भी हो रहे हैं, लेकिन क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं और क्या धरातल

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की विशाल फौज को देखकर लोग अनायास ही कह देते हैं कि शिक्षा को 'रोजगार परक' बनाया जाना चाहिए। उनका तात्पर्य यह होता है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावाएँ हैं, उनसे संबंधित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अधिकांश महाविद्यालयों में शिक्षा के नाम पर भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, आदि विषय ही पढ़ाए जाते हैं। और इन विषयों की डिग्री लेने से किसी को कोई नौकरी मिलेगी, इसका कोई भरोसा नहीं। अत: ऐसे विषयों की पढ़ाई एवं उन पर होने वाले सरकारी खर्च के औचित्य पर प्रश्न उठना लाजिमी है। आखिर शिक्षा को

सिर्फ शिक्षा नहीं गुणवत्तायुक्त शिक्षा आज अभिभावकों की प्राथमिकता सूची में सर्वोपरि है। अपने बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अभिभावक अपनी आय का बड़ा हिस्सा स्कूली शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी, गणित, विज्ञान आदि का समुचित ज्ञान हासिल करें ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो सके जबकि तमाम सरकारी व गैरसरकारी शोध बताते हैं कि सरकारी स्कूलों के 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे 3सरी व 5वीं कक्षा की हिंदी व अंग्रेजी की सामान्य पाठ्यपुस्तक को पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। दो अंकों के जोड़ व घटाव करने में भी वे असक्षम हैं..

मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद से जाते जाते अरविंद सुब्रमणियन शब्दकोश को एक नयी शब्दावली “कलंकित पूंजीवाद” देते गए। इसके जरिए वह यह कहना चाहते थे कि स्वतंत्र बाजार को आज भी भारत में समुचित स्थान नहीं मिल सका है। समस्या गहरी होती जा रही है। अधिकतर भारतीय वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से बगैर सोचे ही आर्थिक विकास पर सवाल उठाने के पाश्चात्य सनक को अंगीकार कर रहे हैं।

Author: 
गुरचरण दास

पूरी दुनिया में इस समय फुटबॉल वर्ल्डकप का रंग चढ़ा हुआ है। लेकिन यदि आपको ये पता चले कि फुटबॉल मैच के सभी नियम किसी एक टीम को फेवर करते हों तो क्या आप उसे देखना पसंद करेंगे..। कुछ ऐसा ही देश में एजुकेशन सेक्टर के साथ होता आ रहा है। प्राइवेट स्कूलों के साथ साथ सरकार स्वयं भी सेवा प्रदाता है। लेकिन प्रतिस्पर्धा की शुचिता बरकरार रखने के लिए तटस्थ नियामक की आवश्यकता को सदैव ही नजरअंदाज किया गया है। जिस कारण निजी स्कूलों के साथ भेदभाव के आरोप लगते रहते हैं..

विकृत और अक्षम प्रशासनिक तौर तरीकों वाली आरटीई हमारे बच्चों को शैक्षणिक भूखमरी का शिकार बना रही है

पिछले लगभग दो महीनों तक देश ताबड़तोड़ क्रिकेट के 20-ट्वेंटी फार्मेट वाले इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के रंग में रंगा है। इस दौरान कई मैच रोमांच की चरम सीमा तक पहुंचे और खेल अंतिम गेंद तक पहुंचा। कई युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने और राष्ट्रीय टीम के चयनकर्ताओं को प्रभावित करने का मौका भी मिला। मैच दर मैच ऐसे ऐसे इनोवेटिव शॉट्स लगातार देखने को मिलें जो आमतौर पर कम ही देखने को मिलते हैं। गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण सहित सभी क्षेत्रों में खिलाड़ियों के अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिले। ऐसे ऐसे कैच भी पकड़े गए जिनकी कल्पना भी नहीं की ज

7 अप्रैल को शिक्षा बचाओ ‘सेव एजुकेशन’ अभियान के समर्थन में देश भर के निजी स्कूल दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए। भारत के 70 वर्षोँ के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। ये स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में ‘लाइसेंस परमिट राज’ के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और शैक्षिक संस्थानोँ के लिए स्वायत्तता और सम्मान की मांग कर रहे थे। यहाँ पहुंचने वाले लगभग 65,000 प्रतिनिधियोँ में से अधिकतर प्रिंसिपल, शिक्षक, कम फीस लेने वाले स्कूलोँ में अपने बच्चोँ को पढ़ाने वाले माता-पिता थे। लेकिन इनके अलावा यहाँ अल्पसंख्यक संस्थान जैसे कि कैथलिक स्कूलोँ के प्रतिनिधि

Author: 
गुरचरण दास

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