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एक भारतीय लेखक को कैंसर पर आई उनकी पुस्तक 'इम्परर ऑफ आल मेलडीज' के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिलने पर हम गर्व कर रहे हों लेकिन इसके साथ ही हमको उन तमाम तरह के कैंसर के बारे में तत्काल सोचना होगा जो हमारी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में घर कर चुके हैं।

अभी भले ही ये कैंसर प्राथमिक अवस्था में हों लेकिन अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया और इनका उपचार नहीं किया गया तो ये कैंसर बहुत जल्द ही घातक रूप ले लेंगे और पहले ही देश की 1.2 अरब आबादी को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के मामले में संघर्ष कर रहे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को और अधिक निशक्त कर देंगे। इन कैंसरों में सबसे पहला और संभवत: सबसे चिंताजनक है अभी संगठित होने की शुरुआत कर रहे देश के स्वास्थ्य सेवा आपूर्ति क्षेत्र में उभरती बुराइयों का कैंसर।

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शांतिपूर्वक तरीके से चल रहे आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और रैलियों को कुचल देने की परंपराएं इतिहास के कई पन्नों मंआ दर्ज हैं। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार और हुकूमत के पास विद्रोह को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं होती। यहीं वजह है कि अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को तमाम सरकारें दबा देती हैं। भ्रष्टाचार और काले धन पर शांतिपूर्वक चल रहे  बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के सत्याग्रह के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया गया।

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मैंने ओसामा बिन लादेन की मौत का जश्न नहीं मनाया। किसी विचार को खत्म करने से कहीं ज्यादा आसान है, किसी व्यक्ति को मार देना। ओसामा की मौत के बाद भी उसके जेहाद की विचारधारा जिंदा रहेगी।

वो 9/11 का मास्टरमाइंड था और जेहाद की दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था। हालांकि लंबे वक्त से वो जेहादी गतिविधियों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन इस बीच उसने अलकायदा के विरोधी मुस्लिमों की हत्या करवाने का घृणित काम किया था।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

भारत की ऊर्जा समस्या बड़ा आकार लेने वाली है। कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल के बड़े उत्पादकों ने हाल ही में कहा कि अगले कुछ सालों में उनके उत्पादन में बहुत कम वृद्धि होगी। जब देश में ईंधन की मांग बढ़ती जा रही है, तब देश के लिए यह बुरी ख़बर है।

इसका मतलब यह हुआ कि और अधिक ईंधन का आयात किया जाएगा और ऊर्जा कंपनियों के आयात खर्च और अधिक बढ़ते जाएंगे। इसका मतलब यह भी हुआ कि भारत का ऊर्जा क्षेत्र तेज़ी से असुरक्षित होता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की बाढ़ और मध्य-पूर्व के देशों में फैल रही अशांति जैसी घटनाओं से विश्व आपूर्ति में आयी बाधाओं और अस्थिर कीमतों के कारण यह कमज़ोरी आ रही है।

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भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर प्रचार करने से कतराते हैं। उन्हे लगता है कि पूंजिवादी संस्थाओं का समर्थन राजनीतिक विफलता का रास्ता है।

Author: 
गुरचरण दास

व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नही है। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नही होता होगा।

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन अंततः मार डाला गया. आतंक की एक इबारत का समापन हुआ लेकिन तमाम संदेह और कयास अभी भी विद्यमान हैं. दुनियां थोड़ी चकित जरूर है लेकिन कहीं एक राहत की आस भी दिख रही है. लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि यदि अमेरिका पूरी दुनियां में कहीं भी छुपे हुए अपने दुश्मनों को ढूंढ़ कर मार सकता है और अपनी धमक कायम कर सकता है तो भारत अपने निर्दोष नागरिकों की हत्याएं चुपचाप क्यों देखता फिर रहा है. पाकिस्तान ने ना जाने कितने भारतीयों को अपनी कायराना हरकतों से मौत की नींद सुला दिया और भारत ने बस केवल वार्ता की बात तक बात सीमित रखी. 1947 से लेकर आज तक पाक के मंसूबों में कोई बदलाव नहीं आया और वह लगातार अपनी निंदित हरकतों को अंजाम देता रहा.

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यदि आतंकवाद का सहारा लेने वाले साधु-संतों का तर्क यह है कि उनका आतंकवाद सिर्फ जवाबी आतंकवाद है, तो मैं कहूंगा कि यह तर्क बहुत बोदा है। आप जवाब किसे दे रहे हैं? बेकसूर मुसलमानों को? आपको जवाब देना है तो उन कसूरवार मुसलमान आतंकवादियों को दीजिए, जो बेकसूर हिंदुओं को मारने पर आमादा हैं। आतंकवाद कोई करे, किधर से भी करे, मरने वाले सब लोग बेकसूर होते हैं।

हाल ही मे जब राज्यों की विधानसभाओं के चुनावी नतीजे सामने आए, तो पश्चिम बंगाल में साम्यवादियों और तमिलनाडु में डीएमके की नाटकीय ढंग से हुई हार को ज़्यादा तवज्जो दी गई। जिन दो राजनेताओं की वजह से जीत मुमकिन हो पाई, उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियों में लोगों ने खूब रुचि ली। केरल का ज़िक्र हुआ ज़रूर, लेकिन जीत के कम अंतर की वजह से, जो सत्ता पर बैठे मुख्यमंत्री की वजह से संभव हो पाई थी। वह मुख्यमंत्री जिन्हें कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक गठबंधन से ज़्यादा अपनी सरकार और दल का कोपभाजन ज़्यादा बनना पड़ा।

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