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पिछ्ले हफ्ते आई एक न्यूज रिपोर्ट ने काफी खलबली मचा दी थी, जिसमेँ नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा था कि स्कूल, कॉलेज और जेलोँ को निजी क्षेत्र के हवाले कर देना चाहिए। जैसा कि पहले से पता था, उनके इस वक्तव्य पर बवाल तो मचना ही था, अधिकतर लोग इस क्षेत्रोँ के निजीकरण की बात सुनकर नाराज हुए, परिणाम्स्वरूप कांत को यह स्पष्ट करना पड़ा कि वह सिर्फ स्कूलोँ के भौतिक संसाधनो में निजी क्षेत्र की भागीदारी की बात कर रहे थे।

चक्रवर्ती राजागोपालाचारी (राजाजी) द्वारा सन् 1959 में स्थापित स्वतंत्र पार्टी राष्ट्रीय स्तर की उदारवादी पार्टी थी। पार्टी ने कांग्रेस सरकार की समाजवादी नीतियों को पुरजोर विरोध किया था। पार्टी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की पक्षधर थी और लाइसेंस राज के समापन की वकालत करती थी। स्वतंत्र पार्टी का उदय; इस मद्देनज़र अभूतपूर्व था क्योंकि यह एकमात्र सांगठनिक प्रतिष्ठान था जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाता था और सर्वशक्तिशाली तकनीकि राज्य के विचार से स्पष्ट रूप से असहमति जताता था। 1962 के पहले आम चुनावों के दौरान पार्टी ने 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की और

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नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था को रोकने के लिए उच्च स्तर के साहस और शासन कला की आवश्कता होगी। यह एक ऐसे देश के इतिहास में महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर दर्ज होगा जहां श्रेष्ठ किस्म की संवैधानिक व्यवस्था के तहत तीसरी श्रेणी (घटिया किस्म) के लोकतंत्र को चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। - नानी पालकीवाला
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क्या आपको पता है? मकर संक्रांति, गणतंत्र दिवस अथवा स्वतंत्रता दिवस पर पतंग उड़ाने के ऐवज में आपको 10 लाख का जुर्माना अथवा 2 वर्ष का कारावास अथवा दोनों हो सकता है। एयरक्राफ्ट एक्ट 1934 के तहत पतंग बनाने, उड़ाने, कटने-फटने पर मरम्मत करने यहां तक कि बैलून उड़ाने के लिए भी आपके पास लाइसेंस होना जरूरी है। ठीक वैसे ही जैसे कि प्लेन उड़ाने के लिए पायलटों को लाइसेंस की जरूरत होती है..
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मैं पैरेंट नहीं हूँ, लेकिन मेरे पैरेंट्स ने यह सुनिश्चित किया कि मेरे साथ गलत न हो!
मैं पैरेंट नहीं हूँ,
न अभी,
और न ही इससे पहले कभी!
यह एक विनती है, अथवा एक उम्मीद भी!
और सम्भतः अंतिम नहीं है.....
मैं भी एक बच्चा रह चुका हूँ, अपेक्षाकृत निश्चिंत बच्चा,
परेशानी क्या होती कभी नहीं जाना!

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ध्यान हो तो धन भी सुंदर है। ध्यानी के पास धन होगा, तो जगत का हित ही होगा, कल्याण ही होगा। क्योंकि धन ऊर्जा है। धन शक्ति है। धन बहुत कुछ कर सकता है। मैं धन विरोधी नहीं हूं। मैं उन लोगों में नहीं, जो समझाते हैं कि धन से बचो। भागो धन से। वे कायरता की बातें करते हैं। मैं कहता हूं जियो धन में, लेकिन ध्यान का विस्मरण न हो। ध्यान भीतर रहे, धन बाहर। फिर कोई चिंता नहीं है। तब तुम कमल जैसे रहोगे, पानी में रहोगे और पानी तुम्हें छुएगा भी नहीं।

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एक प्रश्न है कि किसी भी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक मजबूती.

Author: 
शिवानंद दिवेदी

मशहूर कवि मलिक मुहम्मद जायसी आज जिंदा होते तो ‘पद्मावत’ लिखने के बाद इस समय कुछ ऐसे संगठनों का विरोध झेल रहे होते जिन्हें कोई जानता तक नहीं है। वो लाख दावा करते कि उनकी लिखी ‘पद्मावत’ काल्पनिक पात्रों पर आधारित है लेकिन राजपूती आन बान शान के रखवाले उनकी किताब की होली जला रहे होते। ऐसे में खुद जायसी भी ‘पद्मावत’ को प्रकाशित करने की बजाय अपनी पांडुलिपि को रद्दी में बेचना ज्यादा पसंद करते पर अफसोस निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली ऐसा नहीं कर सकते। 250 करोड़ रुपये लगाकर उन्होंने इतिहास को काल्पनिक जामा पहना रुपहले पर्दें को जीवंत कर फिल्म पद्मा

Author: 
नवीन पाल

पहली बार कर्नाटक सरकार ने एक प्रस्ताव दिया जिसका उद्देश्य था लोगोँ के लिए व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल की शुरुआत करना और उसे चलाना आसान बनाना। प्रस्ताव के अनुसार, एक शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए कोई भी प्राइवेट बॉडी लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) रजिस्टर  कराकर काम कर सकती है, उसके लिए एक सोसायटी अथवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कार्य करने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन इसकी शर्त यह होगी कि इनका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा ही होगा और संस्थान नॉन-प्रॉफिट शेयरिंग आधार पर ही चलेगा।

कल्पना कीजिए कि आप एेसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं।

Author: 
गुरचरण दास

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