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सिर्फ शिक्षा नहीं गुणवत्तायुक्त शिक्षा आज अभिभावकों की प्राथमिकता सूची में सर्वोपरि है। अपने बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अभिभावक अपनी आय का बड़ा हिस्सा स्कूली शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी, गणित, विज्ञान आदि का समुचित ज्ञान हासिल करें ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो सके जबकि तमाम सरकारी व गैरसरकारी शोध बताते हैं कि सरकारी स्कूलों के 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे 3सरी व 5वीं कक्षा की हिंदी व अंग्रेजी की सामान्य पाठ्यपुस्तक को पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। दो अंकों के जोड़ व घटाव करने में भी वे असक्षम हैं..

मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद से जाते जाते अरविंद सुब्रमणियन शब्दकोश को एक नयी शब्दावली “कलंकित पूंजीवाद” देते गए। इसके जरिए वह यह कहना चाहते थे कि स्वतंत्र बाजार को आज भी भारत में समुचित स्थान नहीं मिल सका है। समस्या गहरी होती जा रही है। अधिकतर भारतीय वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से बगैर सोचे ही आर्थिक विकास पर सवाल उठाने के पाश्चात्य सनक को अंगीकार कर रहे हैं।

Author: 
गुरचरण दास

नेताजी का मन उदास था। रह रहकर कुछ अजीब सी 'फीलिंग' हो रही थी। चलते मॉनसून सत्र में उनका काम में मन नहीं लग रहा था। इलाके के लोगों ने कई सवाल देकर भेजा था उन्हें लेकिन वो आज साथी सांसदों के लिए भी खुद एक सवाल बन गए थे। उनके मुरझाए हुए चेहरे को देखकर आलाकमान ने भी उन्हें आज जरुरी हो तो सिर्फ गांधी प्रतिमा के पास मुंह पर काली पट्टी बांधने का काम दिया था, जबकि जिनके चेहरे पर तेज था, उन्हें वेल में उतरकर हल्ला-गुल्ला करने और कागज उड़ाने जैसे तमाम अधिकार थे। नेताजी को डर सताने लगा था कि हाल यही रहा तो उनका टिकट कट सकता है। नेताजी का प्लान था कि मॉनसून सत्र के आरंभ होते ही वो पर

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जब हम अपनी आज़ादी का उपयोग जिम्मेदारी से करते हैं, तब हमें पता चलता है कि वास्तव में हम कुछ अलिखित नियमों तथा शर्तों से बंधे हुए हैं। हमें पता चलता है कि हम कुछ भी अंधाधुंध करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।

मेरे गुरु महर्षि अमर ने हमें समझाया था कि हमें इच्छा-स्वातंत्र्य का वरदान मिला हुआ है। हम कुछ भी यहां तक कि गलत चुनने के लिए भी स्वतंत्र हैं। हम कभी गलत चीजों का चुनाव करते हैं, गलतियां करते हैं, असफल होते हैं। किंतु हम सीखते हैं और बदलते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सत्य है, जिसे हमें समझना होगा।

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भरी गर्मी और तपती दोपहरी से बचने के लिए आपने अपने कमरे में लगवाने के लिए नया एसी लिया है लेकिन आप अपना कमरा कितना ठंडा करेंगे इसका फैसला सरकार करेगी। ये सुन आपका चौकना स्वाभाविक है लेकिन सरकार कुछ ऐसा ही करने का मन बना रही है।

11 जुलाई, 1987 में विश्व की जनसंख्या ने 5 अरब के आंकड़े को पार किया था। तब संयुक्त राष्ट्र ने जनसंख्या वृद्धि को लेकर दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए यह दिवस मनाने का निर्णय लिया। तब से इस विशेष दिन को हर साल एक याद और परिवार नियोजन का संकल्प लेने के दिन के रूप में याद किया जाने लगा। विभिन्न मंचों पर विशेषज्ञों, चिंतकों, नीति-निर्धारकों आदि के द्वारा बढ़ती जनसंख्या से जुड़ी समस्या और इसकी भयावहता से लोगों को अवगत कराते हुए अपनी चिंताओं को प्रदर्शित करने का चलन शुरू हो गया। 'विश्व जनसंख्या दिवस' के आयोजनों के दौरान समाजशास्त्रियों के द्वारा विश्व भर में बढ़ती जनसंख्या

पूरी दुनिया में इस समय फुटबॉल वर्ल्डकप का रंग चढ़ा हुआ है। लेकिन यदि आपको ये पता चले कि फुटबॉल मैच के सभी नियम किसी एक टीम को फेवर करते हों तो क्या आप उसे देखना पसंद करेंगे..। कुछ ऐसा ही देश में एजुकेशन सेक्टर के साथ होता आ रहा है। प्राइवेट स्कूलों के साथ साथ सरकार स्वयं भी सेवा प्रदाता है। लेकिन प्रतिस्पर्धा की शुचिता बरकरार रखने के लिए तटस्थ नियामक की आवश्यकता को सदैव ही नजरअंदाज किया गया है। जिस कारण निजी स्कूलों के साथ भेदभाव के आरोप लगते रहते हैं..

टेलीविजन पर 'साफ नीयत सही विकास' के विज्ञापन को लगभग घूरते हुए पड़ोसी शर्मा जी बुदबुदाए- "हद है...क्या बकवास है। बंद करो इसे यार।" ज़िंदगी जिस तरह मेरे साथ दिन में कई बार मजाक करती है, मैंने सोचा थोड़ा मजाक शर्माजी के साथ कर लिया जाए। मैंने पूछा- "आपने विज्ञापन को बकवास कहा या टीवी को या मुझे। आपने टीवी को बंद करने के लिए कहा, विज्ञापन को या मुझे।" शर्माजी झुंझलाए। बोले-"अब तुम दिमाग का दही मत करो। वैसे ही 18 घंटे लेट घर पहुंचा हूं। दिमाग सही ठिकाने पर नहीं है।"

जब हम जैसे लोग यह कहते हैं कि - जनसंख्या समृद्धि का कारक है, केवल मनुष्य ही ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है और नक्शे पर अंकित प्रत्येक बिन्दु, जनसंख्या की दृष्टि से सघन है और ज्यादा सम्पन्न है, तो उनके जैसे (तथाकथित समाजवादी) लोग प्राकृतिक संसाधन की कमी की बात करते हैं। उनका तर्क है कि पृथ्वी पर संसाधन सीमित हैं और यदि ज्यादा लोग होंगे, तो ये जल्दी समाप्त हो जायेंगे। प्राकृतिक संसाधनों की कमी की समस्या का जूलियन साइमन ने गहनतापूर्वक अध्ययन किया। उन्होंने दीर्घकालिक मूल्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों का अध्ययन किया और इससे बड़े रोचक परिणाम निकलकर आये कि वेतन एवं मुद्रास्फीति

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