मुक्त व्यापार

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और इसकी इ

Author: 
गुरचरण दास

किसी भी शब्द को लेकर समाज में एक ख़ास किस्म की सकारात्मक अथवा नकारात्मक अवधारणा का बन जाना कोई नई बात नही है. 'बाजार' अर्थात 'मार्केट' शब्द  भी इससे अछूता  नही  है। आमतौर  पर  यदि  आप  किसी भी व्यक्ति से  एक सवाल पूछें कि क्या देश में  बाजार के लिए आजाद एवं उदार माहौल होना चाहिए ? अथवा क्या बाजार पर बंदिशों की बजाय छूट का माहौल ज्यादा होना ठीक है ? आपको बहुतायत में जो जवाब मिलेगा वो 'नही' में होगा।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

वर्ष 2014 में भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी संभावना और चुनौती होगी, वह आर्थिक विकास की उच्च दर को वापस लौटाने की होगी, जैसा कि कुछ वर्ष पहले था। यह केवल उच्च विकास ही है जो हमारे देश की सतत समृद्धि को सुनिश्चित करेगी। 2014 के आम चुनावों में हमें अवश्य ही एक ऐसे उम्मीदवार और पार्टी के पक्ष में मतदान करना चाहिए जो विकास को वापस पटरी पर लौटा सके।

Author: 
गुरचरण दास

सम्पूर्ण विश्व में शहरीकरण श्रम विभाजन की सहायता से समृद्धि बढ़ाता है। इसलिए भारत जैसे देशों में शहरीकरण को संपन्नता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाना सरकार के पिछले 50 वर्षों के प्रयासों (ग्रामीण विकास के नाम पर निर्रथक धन का व्यय) की अपेक्षा बेहतर विकल्प है। अभी हाल ही के आर्थर एंडरसन फार्च्यून के विश्वव्यापी सर्वे में भारत के शहरों को सबसे खस्ताहाल स्थिति में पाया गया। निश्चित ही संपन्न देश होने का यह तरीका नहीं है।