शासन

कुछ दिनों पहले खबर थी कि केंद्र सरकार ने बजट में 2.80 लाख कर्मचारियों की भर्ती का प्रावधान किया है। यह प्रधानमंत्री के इस वादे के खिलाफ है कि उनके नेतृत्व में कम सरकार, अधिक शासन मूल मंत्र रहेगा। मैंने भोलेपन में इसका यह अर्थ लगाया कि यह मेरी, आपकी और आम नागरिकों की जिंदगी को अधिक आसान बना देगा, जो नियमों की भूल-भुलैया में से राह निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिछले दशकों में अधिकांश भारत को चलाने वाली सुस्त और विशाल नौकरशाही में पर्किंसन्स लॉ (नौकरशाही की अनियंत्रित वृद्धि) के साथ नियम-कानून भी खरगोशों की तरह तेजी से बढ़ते चले गए।

राजधानी दिल्ली के शिक्षा निदेशालय के हवाले से मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक शैक्षणिक सत्र 2017-18 में ईडब्लूएस कैटेगरी के तहत नर्सरी कक्षाओं दाखिलों के लिए कुल 1,13,991 आवेदन प्राप्त हुए। बीते दिनों निदेशालय द्वारा लॉटरी/ ड्रॉ प्रक्रिया के बाद कुल उपलब्ध 31,653 सीटों के लिए पहली सूची जारी की गयी। निजी स्कूलों में दाखिले की इच्छा रखने वाले 82,338 छात्रों के अभिभावकों के लिए उहापोह की स्थिति बनी हुई है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनके बच्चों को दाखिला कैसे मिलेगा।

समाज की बसावट और बनावट का स्वरूप कितना भी योजनाबद्ध क्यों न हो उसे अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए एक अनियोजित ढंग से विकसित वातावरण की जरुरत होती ही है। फुटपाथ पर लगने वाले छोटे-बड़े ठेले, खोमचे व अस्थायी दुकाने इसी का उदाहरण हैं। हर सोसाइटी, हर मोहल्ले एवं कालोनी के आस-पास के एक फुटपाथ का बाजार स्वत: विकसित हो जाता है। इस बाजार के स्वत: विकसित होने के पीछे दो मूल वजहें हैं जो कारक होती हैं। पहली वजह, वहां रहने वाले लोगों की दैनिक जरूरतों की पूर्ति एवं दूसरी वजह उन जरूरतों की पूर्ति की वजह से रोजगार सृजन के स्थानीय अवसरों की उपलब्धता। फुट

अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना दरअसल, टीएमए पई बनाम कर्नाटक सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 11 सदस्यीय खण्डपीठ के फैसले की अवज्ञा है। सरकार द्वारा अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना, न केवल संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त संरक्षण का स्पष्ट उल्लंघन है बल्कि निष्प्रभावी और अबाध्यकारी भी है। निसा के माध्यम से हमने इस मुद्दे को उठाया है और बार-बार दोहराया भी है कि ऐसी कार्रवाई माननीय सर्वोच्च न्यायालय 11 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के निर्णय का अपमान है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करना ह

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च क

दो दशक पूर्व लाइसेंस, परमिट, कोटा आधारित प्रशासनिक व्यवस्था के दौर में जब अधिकांश सेवा प्रदाता कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की यानि सरकारी हुआ करती थीं तब उपभोक्ताओं के लिए उन सेवाओं को हासिल करना टेढ़ी खीर हुआ करती थीं। बात चाहे हवाई जहाज की यात्रा करने की हो या टेलीफोन कनेक्शन लेने की, ऐसी सेवाएं लग्जरी की श्रेणी में शामिल हुआ करतीं थीं और स्टेटस सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं और मध्यवर्ग के लिए ऐसा कर पाना किसी बड़े सपने के पूरा होने से कम नहीं हुआ करता था। इसके अलावा सेवा की गुणवत्ता की बात करना तो जैसे दूसरी दुनियां की बात थी। लेकिन आज परिस

वर्ष 2016 के अंत के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है। अतः मध्यावधि समीक्षा के लिये यह अच्छा समय है। मगर ऐसी किसी भी समीक्षा पर विमुद्रीकरण आघात से जुड़ी घटनाओं का प्रभुत्व तो रहेगा ही। इस एक अल्पावधि के घटनाचक्र को छोड़कर सरकार को अपने कार्यकाल के उत्तरार्ध में किस एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार पर जोर देना चाहिये? तो मैं यह कहूँगा कि यह हमारी विफल शिक्षा नीति है जिसमें सुधार की जरुरत है। आगे पूरा आलेख इसी बात की व्याख्या करेगा कि ऐसा क्यों जरुरी है?

सरकारी जमीन पर बने प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के एक मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सरकार की अनुमति को आवश्यक बताया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूली फीस एक बड़ा मुद्दा है; सामाजिक मुद्दा भी और राजनैतिक मुद्दा भी। एक तरफ स्कूल प्रबंधन अपने खर्चे का हवाला देते हुए फीस वृद्धि को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश करता है वहीं अभिभावक और उनके साथ साथ सरकार इसे स्कूलों की मनमानी बताती है। अभिभावक चाहते हैं कि स्कूली फीस के मामले में सरकार दखल दे और स्कूलों की मनमानी से उन्हें निजात दिलाए। शिक्षा के क्षेत्र मे

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