शासन

एक राज्य का नया वित्तमंत्री काकभुशुण्डजी से मिलने गया और हाथ जोड़कर बोला कि मुझे शीघ्र ही बजट प्रस्तुत करना है, मुझे मार्गदर्शन दीजिए. तिस पर काकभुशुण्ड ने जो कहा सो निम्नलिखित है:

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समाज के कमजोर तबके की सुरक्षा सुनिश्चित करना हर सभ्य समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भारत के संदर्भ में बात करेँ तो यहाँ बच्चोँ, महिलाओँ और अल्पसंख्यकोँ की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार और पूरे समाज के हाथ में है। यहाँ महिलाओँ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मामले में कई महत्वपूर्ण बाधाएं हैं क्योंकि यहाँ तमाम तरह के पितृसत्तात्मक नियम बना दिए गए हैं जिन्हेँ न सिर्फ महिलाओँ की अधिकतर हिस्से बल्कि तकरीबन सभी पुरुषोँ का समर्थन हासिल है। लेकिन बच्चोँ की सुरक्षा के मामले में सरकारी मशीनरी की शिथिलता, भ्रष्टाचार और जांच के निष्क्रिय व पुरा

वर्ष 2018 के लिए बजट पेश करने का समय नजदीक आ गया है। पूर्ण बजट पेश करने का यह मोदी सरकार के कार्यकाल का आखिरी मौका होगा। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और वित्त मंत्री का ध्यान सभी को खुश करने पर होगा। आर्थिक प्रगति और विकास का नारा देकर सत्ता में आयी मोदी सरकार का ध्यान शुरू से ही शिक्षा पर भी रहा है। नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसी एजेंडे के तहत शुरू किया गया था हालांकि इसमें अबतक सफलता नहीं मिल सकी है। स्मृति ईरानी को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा और प्रकाश जावड़ेकर को बड़ी उम्मीदों के साथ यह जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके

- सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि आधार कार्ड के इस्तेमाल से 60,000 करोड रुपये बचे हैं, इसका मतलब है कि सिस्टम में तमाम खामियाँ हैं। 
- सरकार हर बच्चे की स्कूलिंग पर साल में कम से कम 25,000 रुपये खर्च करती है। इसके बावजूद सरकारी स्कूल अच्छी शिक्षा देने में असफल हैं, इसके लिए डिलिवरी सिस्टम ही जिम्मेदार है।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च क

पहली बार कर्नाटक सरकार ने एक प्रस्ताव दिया जिसका उद्देश्य था लोगोँ के लिए व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल की शुरुआत करना और उसे चलाना आसान बनाना। प्रस्ताव के अनुसार, एक शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए कोई भी प्राइवेट बॉडी लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) रजिस्टर  कराकर काम कर सकती है, उसके लिए एक सोसायटी अथवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कार्य करने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन इसकी शर्त यह होगी कि इनका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा ही होगा और संस्थान नॉन-प्रॉफिट शेयरिंग आधार पर ही चलेगा।

कल्पना कीजिए कि आप एेसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं।

Author: 
गुरचरण दास

'यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन' (यूनेस्को) ने हाल ही में वर्ष 2017-18 के लिए 'द ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जीईएम) रिपोर्ट' को जारी किया है। रिपोर्ट में दुनियाभर में स्कूली शिक्षा के हालात पर प्रकाश डाला गया है। लेकिन यूनेस्को की रिपोर्ट, भारत में स्कूली शिक्षा को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित नजर आ रही है। रिपोर्ट का नाम 'अकाउंटेबिलिटी इन एजुकेशन' भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ज्यादा प्रतीत होता है। यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में भारत सहित अन्य देशों में स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में अकाउंटेबिलिटी अर्थात जवाबदेही क

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्यवस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है। 

Author: 
नवीन पाल

किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

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