West Bengal

किसानों व मछुआरों के आंदोलन के चलते सरकार पूर्व मेदिनीपुर जिले के हरिपुर इलाके में प्रस्तावित परमाणु बिजली संयंत्र निर्माण के फैसले से पीछे हट गई। इससे स्थानीय लोग खुश हैं। पूर्व वामो सरकार इस परियोजना को अपनी उपलब्धि बताती थी, और कहती थी कि इससे बंगाल को विद्युत में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। जिस समय यह घोषणा हुई थी, उस समय तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी नंदीग्राम कांड को लेकर आंदोलन कर रही थीं।

पिछले हफ्ते आए चुनाव नतीजों में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन को 294 सदस्यों वाली विधानसभा में 226 सीटें हासिल हुईं और इस जीत के साथ ही 34 साल से चला आ रहा लेफ्ट का शासन खत्म हो गया। वामपंथी दलों ने अपनी हार स्वीकार करते हुए विपक्ष की सकारात्मक भूमिका निभाने की बात कही तो वहीं ममता ने इसे लोकतंत्र और बंगाल की जनता की जीत बताया है.

पश्चिम बंगाल में बदलाव के लिए अब तक चले संघर्ष में शहीद हुए कार्यकर्ताओं को यह जीत समर्पित करते ममता ने विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर को याद किया और कहा कि यह जीत मां, माटी और मानुष की है।

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कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय के भीतर का नजारा देखकर अंदाजा हो जाता है कि आखिर क्यों यह पार्टी ममता बनर्जी के ‘परिबोर्तन’ यानी बदलाव के नारे के आगे असहाय हो गयी। कुछ समय पहले कोलकाता में एक यात्रा के दौरान मेरे अनुभव बहुत रोचक हैं. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इंतजार में बैठने से पहले हमें कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़े से कमरे में हलकी रोशनी है, जिसमें रखी कुरसी पर बैठकर आप अपने स्कूल के परीक्षा वाले दिनों में खो जाते हैं। आसपास का दृश्य अतियथार्थवाद की बुनावट-सा लगता है। दीवार पर करीने से गुजरे जमाने के कम्युनिस्ट दिग्गजों की तसवीरें लगी हैं। वहां सभी हैं- कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, हो ची मिन्ह। उनके साथ राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के कम्युनिस्ट नेताओं और क्रांतिकारियों की तसवीरें भी लगी हैं। मगर एक मुश्किल यह है कि इन सभी नेताओं के नाम चीनी लिपि में लिखे हैं, जिन्हें पहचान पाना मुश्किल है।

बहुत साल बाद कोलकाता जाने का मौक़ा लगा. तीन दिन की इस कोलकाता यात्रा ने कई भ्रम साफ़ कर दिया. ज्यादा लोगों से न मिलने का फायदा भी होता है. बातें बहुत साफ़ नज़र आने लगती हैं. जनता के राज के ३३ साल बहुत अच्छे लग रहे थे. लेकिन जब वहां कुछ अपने पुराने दोस्तों से मुलाक़ात हुई तो सन्न रह गया. जनवादी जनादेश के बाद सत्ता में आयी कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति की चिन्दियाँ हवा में नज़र आने लगीं. नंदीग्राम में जब तूफ़ान शुरू हुआ तो वहां एक भी आदमी तृणमूल कांग्रेस का सदस्य नहीं था. जो लोग वहां सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे वे सभी सी पी एम के मेम्बर थे और वे वहां के सी पी एम के मुकामी नेताओं के खिलाफ उठ खड़े हुए थे. कोलकता की राइटर्स बिल्डिंग में बैठे बाबू लोगों को जनता का उठ खड़ा होना नागवार गुज़रा और अपनी पार्टी के मुकामी ठगों को बचाने के लिए सरकारी पुलिस आदि का इस्तेमाल होने लगा. सच्ची बात यह है कि वहां सी पी एम के दबदबे के वक़्त में तो वाम मोर्चे के अलावा और किसी पार्टी का कोई बंदा घुस ही नहीं सकता था. 

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