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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की चुनाव प्रणाली आज बहस के केंद्र में है। सत्ताधारी दल भाजपा के साथ-साथ अनेक दलों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों का मानना है कि देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। हालांकि एकसाथ चुनाव कराने के विचार से असहमति रखने वाले दलों की भी कोई कमी नहीं है। कांग्रेस सहित अनेक दल- जैसे तृणमूल कांग्रेस, बसपा, टीडीपी और कम्युनिस्ट पार्टी, ने एक साथ चुनाव कराने से असहमति व्यक्त की है। इस बहस में सहमति और असहमति के पाटों पर खड़े दो खेमों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन यह बहस आज के दौर

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शिवानंद दिवेदी

यदि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देने के फैसले के जरिये सरकार उस बनती धारणा को समाप्त करना चाह रही थी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दूसरे कार्यकाल में नीतिगत स्तर पर लकवाग्रस्त स्थिति है, तो सरकार मकसद में बुरी तरह नाकाम हुई। इसके बजाय संप्रग के नाराज सहयोगी दल आरोप लगा रहे हैं कि उनसे परामर्श नहीं किया गया, सत्तारूढ़ कांग्रेस में भी विरोधाभास के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं और एकजुट विपक्ष संसद के भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर सरकार को कमजोर करने पर आमादा है।

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काफी लंबे समय से महंगाई की मार से कराह रहा आमजन अब और किसी भी तरह के बोझ को ढोने के लायक नहीं बचा है। यही वजह है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव-नतीजों के बाद जैसे ही कंपनियों ने पेट्रोल के दाम बढ़ाए आवाम विरोध स्वरूप सड़कों पर उतर आई। नाराज लोगों ने जगह-जगह केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पुतले फूंके। इसे देखते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं कि पेट्रोल की कीमतों का निर्धारण कंपनियां करती हैं, सरकार नहीं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सरकार के खिलाफ एक्शन लेने की बजाय तेल कंपनियों को ऐसा कोई रास्ता सुझाया जाए जिससे दाम कम बढ़ें और घाटा भी कम हो।

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