United Nations

संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं| उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्तराष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी काम-काज नियमावली की धारा 51 में संशोधन करवाकर हिंदी का नाम जुड़वाना होगा| इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं| सूरिनाम में संपन्न हुए पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन में मैंने इस प्रस्ताव पर जब हस्ताक्षर करवाए तो सभी दलों के सांसद मित्रों ने सहर्ष उपकृत कर दिया|

गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई ने दुनिया में एक नई विसंगति पैदा की है। हमारी एक पृथ्वी पर दो दुनिया बसी हुई हैं- एक में गरीब लोग भुखमरी से बचने के लिए पसीना बहा रहे हैं, जबकि दूसरी में अमीरों को नहीं सूझ रहा है कि वे अपनी धन-दौलत कैसे खर्च करें। एक पृथ्वी पर दो दुनिया की स्थिति बहुत लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती।

जल और स्वच्छता (सेनिटेशन) का संकट विश्व में अरबों लोगों को प्रभावित कर रहा है। इससे नियमित रूप से बच्चों की मौत हो रही है। वर्तमान में, 1,10 अरब लोगों (विश्व की 17 फीसदी आबादी) को स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अस्वच्छ पानी और अस्वच्छता के कारण प्रतिवर्ष लाख लोगों की मौत होती है। विश्व में लगभग 2 अरब लोगों की शौचालयों एवं स्वच्छता संबंधी अन्य सुविधाओं तक पहुंच नहीं है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का दूसरा प्रमुख कारण डायरिया है।