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आखिरकार जमीन और जंगल के अन्यायपूर्ण राष्ट्रीयकरण की नीतियों में आंशिक सुधार का रास्ता तैयार हो रहा है। मंत्रियों के एक समूह ने एक खनन विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसमें यह व्यवस्था की गयी है कि स्थानीय समूहों (आदिवासियों या ग्रामीणों) को कोयले के खनन से होने वाले लाभ में 26 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी और अन्य खनिजों के खनन के मामले में राज्य सरकार को पिछले साल दी गई रायल्टी के बराबर राशि ग्रामीणों को भी दी जाएगी।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

एक साल पहले तकरीबन इन्हीं दिनों में राहुल गांधी ने ओडिशा में कुछ आदिवासियों से कहा था कि वे दिल्ली में उनकी लड़ाई लड़ेंगे। नियमगिरि के डोंगरिया कोंड आदिवासी बिसार दिए गए और अब राहुल का फोकस यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर नोएडा के जाट किसानों व अन्य समूहों की ओर हो गया है।

राहुल गांधी का यह व्यवहार समूचे राजनीतिक वर्ग के चरित्र को प्रदर्शित करता है। देश की आजादी के बाद संविधान द्वारा चिह्न्ति ऐसे दो समूहों में आदिवासी भी एक थे, जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। इसी वजह से संसद में व सरकारी नौकरियों में दलितों के अलावा आदिवासियों के लिए भी सीटें आरक्षित की गईं।

आदिवासी इलाकों में स्थित राशन दुकानों में खराब खाद्यान्न दिए जाने का आरोप लगाते हुए वामपंथी दल सीपीएम ने इसकी जांच विशेष निगरानी एजेंसी से कराए जाने और गोदामों में पड़ा खाद्यान्न गरीबों में वितरित किए जाने की मांग की है। बता दें कि करीब सात महीने पहले अगस्त 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने खाद्यान्न के कुप्रबंधन पर केंद्र सरकार को लताड़ पिलाई थी और कहा था कि बरबाद हो रहा अनाज मुफ्त में गरीबों को बांट दिया जाना चाहिए।

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