Shiksha

निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा का मुद्दा राजनैतिक गलियारे में हमेशा से ‘हॉट’ रहा है। पिछले लगभग एक दशक के दरम्यान इस मुद्दे ने इतना गंभीर रुख अख्तियार कर लिया कि इस मुद्दे पर पूरा का पूरा चुनावी अभियान केंद्रीत होने लगा। वर्तमान की दिल्ली सरकार तो राज्य में स्कूलों की फीस को सख्ती से नियंत्रित करने के कदम को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है। दिल्ली की देखा देखी महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, हरियाणा, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने अपने यहां फीस नियंत्रण कानून लागू कर दिए हैं और कई अन्य राज्य इसी प्रकार का कानून लागू करने की दिशा

इस बात से कोई भी इंकार नहीं करेगा कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा ही 21वीं सदी के भारत की दशा और दिशा तय करेगी। केंद्र और राज्य सरकारें भी अब इस ओर काफी गंभीर दिखाई प्रतीत होती हैं। मोदी सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसकी एक बानगी है। हालांकि देश में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था विशेषकर प्राथमिक शिक्षा की हालत में सुधार होने की बजाए खराबी ही आई है।

निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी और उस पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तरफ से की जा रही कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। बेशक निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस में बढ़ोत्तरी को अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन फीस बढ़ोतरी नियंत्रित कैसे हो इसके तरीके अलग अलग हो सकते  हैं। निजी स्कूलों के फीस नियंत्रण पर चर्चा करने से पहले एक अहम सवाल यह है कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के बाद अध्यापकों के वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है?

विकास की मंजिल पाने की मुख्य राह शिक्षा दिखाएगी। तरक्की में शिक्षा अहम है। यह जुमला विद्वानों की सभा से लेकर, गोष्ठिïयों, संगोष्ठियों में खूब सुनाई देगा। मगर उज्जवल भविष्य की नींव कहलाने वाली शिक्षा, आम जन की पहुंच से उतनी दूर और मुश्किल हो रही है, जैसे मंगल पर पानी की खोज। चुनावी बिसात पर बैठे नेताओं ने अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को आरटीई के सांचें में ढाला। मगर यहां भी बढ़ती मुनाफाखोरी ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को कुचलता हुआ आगे निकल गया। स्कूलों के गेट पर सुबह ६ बजे से बच्चों के एडमिशन के लिए लगी अभिभावकों की लंबी कतारों से जाहिर होता ह

- 'एजुकेशनः फिलॉसफी, पॉलिसी एंड प्रैक्टिस' विषयक वर्कशॉप के दौरान शिक्षा के वर्तमान व भावी स्वरूप और नीतियों पर हुई गहन चर्चा
- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी और आजादी.मी ने मीडियाकर्मियों के लिए किया था दो दिवसीय वर्कशॉप का आयोजन