Salary

समाजवाद के 6 चमत्कार

1- किसी के पास काम नहीं, लेकिन कोई बेरोजगार नहीं
2- कोई काम नहीं करता, लेकिन पैसे सभी को मिलते हैं
3- पैसे सभी को मिलते हैं, लेकिन इस पैसे से खरीदने के लिए कुछ भी नहीं होता
4- कोई कुछ नहीं खरीद सकता, लेकिन सभी चीजों पर सबका स्वामित्व होता है
5- सभी चीजों पर सबका स्वामित्व होता है, लेकिन कोई संतुष्ट नहीं होता
6- कोई संतुष्ट नहीं होता, लेकिन 99% लोग सिस्टम के लिए मतदान करते हैं

Category: 

शिक्षा जीवन की ऐसी कड़ी है, जहां से तरक्की और खुशहाली के सारे रास्ते खुलते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आर्थिक उन्नति का आधार भी शिक्षा ही है, लेकिन यही शिक्षा अगर मजाक बनकर रह जाए तो क्या कहिएगा?

अगर देश का अमीर तबका कुछ अधिक सादगीपसंद होता तो क्या देश के कुछ और अधिक लोगों की जिंदगियां मौजूदा के मुकाबले बेहतर होतीं? अतिशय खर्च के खिलाफ मौजूदा लड़ाई हमें बताती है कि मध्य वर्ग की बढ़ती आय और तेजी से ऊपर उठती जीवनशैली, और साल दर साल करोड़पतियों की बढ़ती संख्या के बीच अर्थशास्त्री बढ़ती असमानता को लेकर लगातार अपनी असहमति जताते रहे हैं।

महज चार वर्ष पहले की बात है,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक सम्मेलन में कारोबारियों को यह सुझाव देकर घबराहट पैदा कर दी थी कि वे 'अत्यधिक पारिश्रमिक का प्रतिरोध' करें और ज्यादा खपत को हतोत्साहित करें। दो वर्ष बाद कंपनी मामलों के तत्कालीन मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहीं अधिक सपाट तरीके से कहा था कि कंपनियां अपने शीर्ष अधिकारियों को अत्यधिक वेतन देने से बचें। वर्ष 2010 में जब अर्थव्यवस्था बढ़ती महंगाई से जूझ रही थी तक कंपनी विधेयक पर संसद की स्थायी समिति ने मुख्य कार्याधिकारियों के वेतन की सीमा तय करने की अनुशंसा की।

Category: