MNREGA

- बदले माहौल में सरकार को अंपायर की भूमिका में होना जरूरी मान रहे हैं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।

बीते सात वर्षों से भी अधिक समय से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार अपने विशिष्ट ब्रांड (तथाकथित) 'समावेशी विकास’ का नारा बुलंद करती आई है। इस मूल विचार के साथ तो कहीं कोई खामी नहीं है क्योंकि इसके मुताबिक आर्थिक विकास के लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचाने की मंशा जताई गई है। खासतौर पर इसे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है। लेकिन इसके लिए जिन नीतियों को अपनाया गया उनमें तमाम गड़बडिय़ां देखने को मिलीं। इसमें गरीबी निरोधक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में काफी इजाफा करने पर जोर दिया गया। इन कार्यक्रमों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा खाद्य और शिक्षा संबंधी अनेक अन्य कार्यक्रम शामिल हैं। इस रवैये से सरकार के खर्च तथा केंद्रीय बजट में की गई सब्सिडी में इजाफा होता गया। चूंकि इस दौरान कर से हासिल होने वाले राजस्व में बहुत अधिक इजाफा नहीं हुआ तो जाहिर है इससे राजकोषीय घाटे की स्थिति निर्मित हुई। इसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ा और ब्याज दरों में भी इजाफा हुआ।

विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

अनेक वर्षों से कई सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा दलित समस्याओं को लेकर देश में जगह-जगह चर्चाएं-परिचर्चाएं की जाती रही हैं. सवाल उठाया जाता रहा है कि आखिर कब तक दलित पूरी तरह से आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहतर होगा और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेगा जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं. ऐसे सवाल भी उठाये जा रहे हैं जो दलितों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की गयी योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न आने को लेकर हैं.