Manufacturing

बीते सात वर्षों से भी अधिक समय से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार अपने विशिष्ट ब्रांड (तथाकथित) 'समावेशी विकास’ का नारा बुलंद करती आई है। इस मूल विचार के साथ तो कहीं कोई खामी नहीं है क्योंकि इसके मुताबिक आर्थिक विकास के लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचाने की मंशा जताई गई है। खासतौर पर इसे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है। लेकिन इसके लिए जिन नीतियों को अपनाया गया उनमें तमाम गड़बडिय़ां देखने को मिलीं। इसमें गरीबी निरोधक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में काफी इजाफा करने पर जोर दिया गया। इन कार्यक्रमों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा खाद्य और शिक्षा संबंधी अनेक अन्य कार्यक्रम शामिल हैं। इस रवैये से सरकार के खर्च तथा केंद्रीय बजट में की गई सब्सिडी में इजाफा होता गया। चूंकि इस दौरान कर से हासिल होने वाले राजस्व में बहुत अधिक इजाफा नहीं हुआ तो जाहिर है इससे राजकोषीय घाटे की स्थिति निर्मित हुई। इसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ा और ब्याज दरों में भी इजाफा हुआ।