Livelihood

प्रायः 'दरिद्रता' और 'निर्धनता' को पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है किन्तु इन दोनों शब्दों में भारी अंतराल है. 'निर्धनता' एक भौतिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास धन का अभाव होता है किन्तु इससे उसकी मानसिक स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है. निर्धन व्यक्ति स्वाभिमानी तथा परोपकारी हो सकता है. 'दरिद्रता' शब्द भौतिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति का परिचायक है जिसमें व्यक्ति दीन-हीन अनुभव करता है जिसके कारण उसमें और अधिक पाने की इच्छा सदैव बनी रहती है. अनेक धनवान व्यक्ति भी दरिद्रता से पीड़ित होते हैं.

कुछ हफ्तों पहले मैंने ‘द सोशल नेटवर्क’ देखी। अद्भुत फिल्म है और इसका असर मेरे दिलो-दिमाग से अब तक गया नहीं है।

द एक्सीडेंटल बिलियनेअर्स किताब पर आधारित यह फिल्म सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक के निर्माण की कहानी बताती है। इसमें आधी हकीकत है और आधा फसाना। फिल्म तो खैर बहुत अच्छे ढंग से बनाई ही गई है, इसकी कहानी और भी ज्यादा शानदार है।

एक आदर्श शहर के लिए क्या-क्या जरूरी सुविधाएं हो सकती हैं? 24 घंटे बिजली और पानी? स्वच्छ वातावरण, कार, साइकिल और पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त चौड़ी सड़कें? शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं, खेल के मैदान, संग्रहालय, आदि? राजनीतिक व्यवस्था में अधिक दिलचस्पी लेने वाले शहर के लिए एक मेयर या महापौर की भी आवश्यकता बता सकते हैं, जिसके पास कर लगाने और प्रशासन के सभी जरूरी अधिकार हों।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

फ्रेडरिक बास्तियात ने अपने बहुचर्चित प्रभावी लेख, “क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता” में लिखा है कि हम कैसे मान लेते हैं कि एक सामाजिक प्रणाली का एक तय परिणाम ही होगा, जबकि इसके कई परिणाम हो सकते हैं। ये सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। सच में तो हम यह भी सोच सकते हैं कि “न देखी गई बात को देखने” की सोच तो कथनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें लगातार कुछ न कुछ जोड़ते रहने की जरुरत है। और वाकई, ‘क्या नहीं देखा जाता’ वाकई दृष्टिकोण का मामला है। और जितने ज्यादा लोग उतने ज्यादा दृष्टिकोण। इसी अलग-थलग बात में मैं कॉमनवैल्थ गेम्स के संबंध में अपने कुछ विचार जोड़ना चाहूंग

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मनरेगा (MGNREGA) के अंतर्गत 100 श्रमिक दिवसों को बढ़ा कर 200 दिवस करने की कई दिनों से बात चल रही है. भारत के अति निर्धनों की आय का स्त्रोत बनी इस विवादित स्कीम के अंतर्गत दिन बढाने का प्रस्ताव सुनने में तो लोक कल्याणकारी लगता है पर इस का बहुत गंभीर आंकलन करने की आवश्यकता है. हमें ध्यान देना होगा की अति निर्धन को आय की गारंटी पहुचाने वाली ये स्कीम कहीं स्थायी रोज़गार गारंटी स्कीम के रूप में ना तब्दील हो जाए. यदि ऐसा होता है तो आर्थिक सुधार के पथ पर चल रहे हमारे देश के लिए ये एक पीछे जाने वाला कदम होगा.

नयी दिल्ली स्थित लोक नीति विचार मंच सेंटर फॉर सिविल  सोसाइटी द्वारा संचालित जीविका: कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका अभियान ओमिदयार नेटवर्क और अशोका चेंजमेकर्स के प्रतिष्ठित "प्रोपर्टी राईट्स: आईडेनटीटी, डिग्निटी एंड ओपोर्चुनिटी फॉर आल" नामक प्रतियोगिता में सेमी-फाईनलिस्ट के तौर पर चुना गया है. नौ देशों में से 19 सेमी-फाईनलिस्ट गरीबों को ज़मीन के हक दिलवा कर समुदायों में परिवर्तन और सुधार लाने के अपने प्रयासों के चलते इस प्रतियोगिता के लिए चुने गए हैं.

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दिल्ली राज्य में गरीबो  को समाज सुधार योजनाओं का लाभ सिंगल विंडो के ज़रिये पहुचाने के लिए 'मिशन कन्वरजेंस' या सामाजिक सुविधा संगम एक अनूठा और लाभदायक प्रयोग है. इस मिशन का उद्देश्य समुदायों के करीब जा कर वितरण बिन्दुओं को खड़ा करना है ताकि गरीब जनता विभिन्न सामाजिक योजनाओं का फल आसानी से उठा सके. एक सोसाइटी की तरह रजिस्टर्ड सामाजिक सुविधा संगम राज्य के तमाम विभागों, NGOs और नोडल एजेंसिओं के लिए एक सुविधा केंद्र की तरह है.

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