Inflation

क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप मे संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

देश में कमर तोड़ महंगाई ने सब का जीना मुश्किल कर दिया है. खाने की चीजों के दाम में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मिल कर आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है. भारत में मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर दिसंबर के अंत में 18.32 फीसदी दर्ज की गई है जो कि  वर्ष 2010 में सबसे अधिक थी.

जनता की कमर तोड़ महंगाई के साथ कदम मिला चुके बीते वर्ष से शायद सबकी सिर्फ यही उम्मीद थी की महंगाई जैसी बीमारी से लोगों को कुछ राहत जरुर मिलेगी क्योंकि वर्ष 2009 ने जनता को महंगाई की आग में बहुत जलाया था लेकिन आग बुझने की आस लगाये बैठी जनता ने अपना एक और वर्ष 2010 के रूप में बिता डाला. गुज़रे साल मे एक तरफ अंत तक राहत के नाम पर सिर्फ महंगाई रूपी जहर को पीते-पीते दामो में बढ़ोत्तरी ही देखने को मिली वहीँ दूसरी तरफ पूरे साल ख़ुशी और देश के विकास में टकटकी लगायी आँखों को अंत में महा घोटालों का तोहफा मिला.

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