Honesty

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियां ईमानदार नहीं लगतीं. उनकी सरकार ने सर्वत्र बड़ी-बड़ी कंपनियों को छूट दे रखी है. ये कंपनियां आम आदमी को मनमोहन सिंह की छतरी तले कुचल रही हैं और मनमोहन सिंह की कान पर जूं भी नहीं रेंग रही है. देश का नागरिक आज पशोपेश में है. डॉ सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी निर्विवादित है. परंतु उनके नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार का भ्रष्टाचार का शीर्ष पर होना भी उतना ही निर्विवादित है. इस अंतर्विरोध को कैसे समझा जाये? विषय ईमानदारी को पारिभाषित करने का है. सामान्य तौर पर ईमानदारी को व्य्क्तिगत सच्चाई के तौर पर समझा जाता है. जैसे कोई व्यिक्ति कहे कि मैं तुम्हें 10 रुपये दूंगा और वह 10 रुपये दे दे तो उसे ईमानदार कहा जाता है. परंतु चोर यदि कहे कि मैं चोरी करने जा रहा हूं तो उसे ईमानदार नहीं कहा जाता है. दरअसल, ईमानदारी के दो पहलू होते हैं- व्यिक्तिगत एवं सामाजिक. ईमानदार उसी को कहा जाना चाहिए जो कि अपने विचारों के प्रति सच्चा होने के साथ-साथ समाज के प्रति भी सच्चा हो.

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