Hazare

अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।

Author: 
गुरचरण दास

64 वर्ष पूर्व कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसने अंग्रेजो के निर्दयी एवं दमनकारी शासन का पर्दाफाश किया. उसने हाल मे अपने साथ भी कुछ ऐसा ही किया. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने जो-जो किया उस से उसने ये सिद्ध कर दिया है की वो खुद भी कितनी निर्दयी ,बेवकूफ एवं दमनकारी है. अन्ना हजारे को जेल में डालकर, उन्होंने ऐसे जन समर्थन की लहर पैदा कर दी है जिसने इस आंदोलन में हुयी पिछली गलतियों को छिपा दिया है.

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

संसद में जनलोकपाल की तीन मुख्य मांगों पर सहमति का प्रस्ताव पारित होने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संदेश लेकर अन्ना के पास पहुंचे केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख ने इसे जनता के सामने पढ़कर सुनाया. इसी के साथ अन्ना ने अपने अनशन को समाप्त करने का ऐलान किया.आजाद भारत में इस अन्दोलन के ज़रिये एक नया इतिहास रचा गया. जनता ने सरकार को अहसास करा दिया कि अब उसको बरगलाया नहीं जा सकता.

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इतिहास गवाह है जब-जब शासकों ने मनुष्यों को जानवरों की तरह हांकने की कोशिश की तब-तब क्रांतियां हुई। यह गलतियां तानाशाह दोहराते रहे और उनका पतन होता रहा। निकट भविष्य की क्रांतियों की देखें तो पाएंगे कि सोवियत संघ का टूटना, कम्युनिस्ट शासन का अंत, ईरान में शाह सल्तनत का पतन और हाल में मिश्र में हुई जनक्रांति इसका उदाहरण है। इन सभी क्रांतियों की जड़ में आर्थिक भ्रष्टाचार एक बड़ा कारण था। सोवियत संघ में कम्युनिष्ट शासन काल में एक नागरिक को आजादी के मौलिक अधिकारों से ही सरकार ने वंचित कर रखा था तो ईरान में शाह सल्तनत के शासक सत्तर के दशक तक मध्यकालीन प्रणाली से राज्य कर रहे थे और मिश्र का हाल भी कुछ ऐसा ही था। मिश्र का अधिकांश धन भ्रष्टाचार की बलि चढ़ रहा था तथा यही हाल लीबिया व सीरिया में था जिस कारण वहां भी शासकों के खिलाफ जनक्रांति शुरू हो गई। जब शासक वर्ग जनमानस में फैली बुराइयों के प्रति अपनी आंखें मूंद ले, शासक जनता की कठिनाइयों के बारे में केवल बयान ही दे और जनता का शोषण करे तो जनता में निराशा व हताशा घर कर लेती है। ऐसे हालात में अन्ना हजारे जैसे जननेता जनता की भावनाओं को व्यक्त करने का जरिया बन जाते है।

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भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपल बिल के लिए प्रदर्शन कर रही अन्ना हजारे और उन की टीम ने जैसे ही सरकार के साथ रामलीला मैदान में अनशन करने संबंधी समझौता होने की घोषणा की, वैसे ही मैदान में तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गयी हैं. तिहाड़ जेल में दो रात गुजारने के बाद दिल्ली के रामलीला मैदान में समाजिक कार्यकर्ता हजारे को एक पखवाड़े के लिए अनशन करने की अनुमति दे दी गयी है. हजारे कल रामलीला मैदान पहुंचेंगे.

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लोकपाल कमेटी के बारे में जो आशंका थी, वह सच निकली| यदि जन-लोकपाल के सारे प्रमुख प्रावधानों को पांचों मंत्री मान लेते तो भला उन्हें मंत्री कौन मानता? उन्हें कोई साधारण राजनीतिज्ञ भी मानने को तैयार नहीं होता| कोई भी राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार के समूल-नाश की बात सोच भी नहीं सकता| क्या भ्रष्टाचार किए बिना आज देश में कोई राजनीतिज्ञ बन सकता है? नेता इतने मूर्ख नहीं हैं कि वे जिस डाल पर बैठे हैं, उसी पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| लोकपाल कमेटी में मंत्रियों ने जो रवैया अपनाया है, उन्हें वही शोभा देता है| वे लोकपाल की जगह धोकपाल लाना चाहते हैं|

लोकपाल बिल मसौदा समिति की सम्पन्न हुई पांचवी बैठक में इस मुद्दे पर विवाद पैदा हो गया है कि प्रधानमंत्री व उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाए अथवा नहीं। सरकार ने प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और सांसदों के संसद में किए गए कार्यो को लोकपाल के दायरे में लाने का विरोध किया है। जनवरी में तैयार सरकारी विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री भी शामिल थे, लेकिन अब सरकार को लगता है कि अगर लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाया गया तो प्रधानमंत्री का पद की गरिमा पर प्रभाव पड़ेगा.

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