Farmers

आखिर इस महिला को उस मराठी कहावत की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है जिसमें कहा जाता है कि 'बैल आजारी पड़ला तार चलेल, बाइल आजारी नको पड़ैला' यानि कि बैल अगर बीमार पड़ जाए तो फिर भी खेती हो सकती है लेकिन घरवाली अगर बीमार पड़ जाए तो काम नहीं चल सकता..!

क्यों कहना पड़ रहा है कि जो युवक अपनी आजीविका के लिए खेती को चुनता है आज उसका विवाह होना मुश्किल हो जाता है..

- आजादी.मी

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जानिए क्यों अकोला (महाराष्ट्र) के किसान जयंत रामचंद्रन बापट प्रतिबंधित एचटीबीटी बीज के प्रयोग को जायज ठहरा रहे हैं। और यह भी जानें कि क्यों उन्हें यह बयान देना पड़ता है कि 'आतंकवाद से व्यक्ति एक बार मरता है लेकिन सरकार के इस प्रावधान के कारण महिला किसान रोज मरती हैं।' किसान सत्याग्रह के दौरान की गई बातचीत के अंश..    - आजादी.मी

हाल ही में लोक सभा में एक बहस के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह टिप्पणी की थी कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सूट-बूट वालों की सरकार चलाते हैं, जो अपने अमीर करीबियोँ का समर्थन करती है और गरीब लोगोँ को नजरअंदाज करती है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

कहने को तो हिंदूस्तान एक देश होने के नाते एक यूनिफाइड मार्केट है लेकिन किसानों के लिए सरकार जब चाहे तब एक नई लक्ष्मण रेखा खींच देती है। किसानों को अपनी ही फसल अपने मनपसंद ग्राहक को बेचने की आजादी नहीं रही है। देश के किसी अन्य प्रांत में तो क्या किसानों को अपना उगाया अनाज अपने तहसील या लोकल मंडी में भी प्राइवेट ट्रेडर्स को देने में कड़ी मनाहियां रहीं हैं। कुछ किलो अनाज को भी अपने साथ दूसरे राज्य में ले जाने पर स्मगलिंग जैसे संगीन मामले आरोपित कर किसानों को 30 दिन तक सलाखों के पीछे धकेला जाता रहा है। प्रस्तुत वीडियो डाक्यूमेंट्री में किसानों की आपबीती उन्हीं की जुबानी सुनें

जब बात किसानों से भूमि अधिग्रहण की आती है तो राजनीतिक दलों और उद्योगों के बीच होड़ शुरू हो जाती है। जब किसान की भूमि अधिग्रहीत की जाती है तो वह जीत की स्थिति में कभी नहीं होता है, चाहे वह कांग्रेस शासित राज्य हो या भाजपा शासित। ग्रेटर-नोएडा में भूमि अधिग्रहण का किसानों द्वारा किए जा रहे विरोध का समर्थन करने वाली भाजपा भी इससे कुछ अलग नहीं है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख राकेश टिकैत का कहना है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार द्वारा जालौर में किसानों की भूमि अधिग्रहीत करने के एवज में उन्हें मात्र 6.8 पैसा प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा दिया जा रहा है।

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क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप मे संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

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