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पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी

‘हिंदी सीखो, हिंदी बोलो, हिंदी अपनाओ’ की भावुकतापूर्ण अपीलें कम नहीं हुई हैं, लेकिन समाज इन अपीलों को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसका अंदाजा स्कूली शिक्षा के ताजा आंकड़ों से हो जाता है। देश भर के स्कूलों से मिले ब्यौरों के आधार पर नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेंशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (DISE) की ओर से जारी इन आंकड़ों के मुताबिक 2008-09 से 2014-15 के बीच हिंदी माध्यम स्कूलों में नामांकन 25 फीसदी बढ़ा है, जबकि इंग्लिश मीडियम स्कूलों का नामांकन इस दौरान बढ़कर दोगुना हो गया है।