Electoral reforms

चुनाव सुधारों पर छिड़ी राष्ट्रव्यापी बहस के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने लोकसभा व विधानसभाओं का कार्यकाल चार साल करने का सुझाव देकर नया सुर छेड़ दिया है। कुरैशी ने पांच साल के कार्यकाल को घटाकर चार साल करने के पीछे कोई व्यावहारिक तर्क पेश नहीं किया है।

देश में लंबे समय से चुनाव सुधारों को लेकर बहस चल रही है। मतदाताओं को 'राइट टु रिजेक्ट' या 'राइट टु रिकॉल' का अधिकार देने का मामला हो या अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का मामला हो या निर्धारित सीमा से अधिक धन खर्च करने वाले प्रत्याशियों को रोकने का मामला, बात बहस से आगे बढ़ ही नहीं पा रही। हर राजनीतिक दल साफ छवि के प्रत्याशियों को टिकट देने की बात तो करता है, लेकिन मौका जब टिकट बांटने का आता है, तो राजनीतिक दल साफ छवि की बजाय 'जिताऊ' उम्मीदवार पर दांव लगाने से नहीं चूकते।

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अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद चुनाव सुधारों के बारे में चर्चा और गहमागहमी बढ़ गई है और अब सरकार ने कहा है कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार और चुनाव में सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प पर विचार करेगी। सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प को लागू करना तो अपेक्षाकृत आसान है। इस बात को लेकर काफी पहले से यह मांग उठ रही है कि अगर किसी मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है, तो उसे यह बात अपने वोट के जरिये कहने का अधिकार होना चाहिए, ताकि राजनैतिक दलों को यह पता चल सके कि भ्रष्ट और अपराधी चरित्र वाले उम्मीदवारों के खिलाफ कितने लोग हैं।

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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भारत के पास लगातार सफल चुनाव संपन्न कराने का और एक मज़बूत व शांतिपूर्ण लोकतंत्र चलाने का अच्छा रिकॉर्ड है.  पिछले पचास सालों में कई देश जो लोकतान्त्रिक उम्मीदों के साथ जन्मे थे, समय के साथ तानाशाही ताकतों और सैन्य विद्रोहों का शिकार हो गए. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश के उदाहरण से ही पता चलता है कि लोकतंत्र चलाना कितना कठिन है. फिर भी भारत विगत कई सालों से परिस्थितियों के साथ लचीलापन रखते हुए लोकतान्त्रिक मान्यताओं को बनाये रखने में कामयाब रहा है.  लोग बड़ी तादातों में वोट करने आते हैं और समय के साथ केंद्र व राज्यों की निर्वाचित इकाईओं में विभिन्न जातियों व सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ा ही है.