Economic Freedom

ग्रामीण भारत में जल और जंगल दो सबसे ज्यादा मूल्यवान संसाधन हैं। लेकिन ये संसाधन इन इलाकों में रहने वाले लोगों के हाथ में नहीं हैं। ये राज्य के हाथ में हैं और राज्य ही इनका प्रबंधन करता है। जल और जंगल ग्रामीण समुदायों की बजाए देश की संपत्ति है। ये राष्ट्रीयकृत संसाधन हैं। इस राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीणों को उनके बहुमूल्य आर्थिक संसाधन से वंचित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है। 
 
एक महत्वपूर्ण सवाल: क्या आर्थिक स्वतंत्रता से सचमुच लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार आता है? श्रीलंका में आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा है। यहां आर्थिक और सामाजिक माहौल भी अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में बेहतर है। फ्रेजर तालिका में आर्थिक मायने में ज्यादा मुक्त देशों और कम मुक्त देशों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में आश्चर्यजनक अंतर देखने को मिलता है।
 

देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिए पर रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा हमेशा से उन्हें शहर की समस्या में ईजाफा करने वाले और लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा माना जाता रहा है। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), नासवी व सेवा जैसे गैर सरकारी संगठन देशव्यापी अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की समस्याओं को दूर करने के लिए उचित संवैधानिक उपाय की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए पिछले दिनों लोकसभा से प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड रेग्यु

इस साल 31 जुलाई को विश्वविख्यात नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की सौंवा जन्मदिन मनाया जाएगा। फ्रीडमैन न केवल आर्थिक वरन सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को अत्यंत महत्व देनेवाले व्यक्ति थे।उनकी सोच  भारत के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक है इस पर विचार करने की जरूरत है।

नई दिल्ली- सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा जारी सालाना वार्षिक रिपोर्ट “इकोनॉमिक फ्रीडम ऑफ द वर्ल्ड 2011’’ में भारत 94वें पायदान पर है। बीते साल वह 90वें स्थान पर था। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के अध्यक्ष पार्थ शाह ने कहा, “बीते साल के मुकाबले भारत की रैंकिंग में गिरावट निराशाजनक है। आर्थिक आजादी बढ़ने के बजाय घटी है। व्यापक भ्रष्टाचार और लाइसेंस राज की परेशानियों ने भारतीयों के लिए बेहतर और अपनी क्षमताओं के साथ जीवन-यापन को बेहद मुश्किल बना दिया है।’’

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