Delhi

राजधानी दिल्ली में भी रविवार को यौन हिंसा के खिलाफ चल रहे वैश्विक प्रतिरोध कार्यक्रम के तहत ‘स्लट वॉक’ यानी बेशर्मी मोर्चे का आयोजन किया गया. विभिन्न आयु वर्ग से जुड़े लोगों ने जंतर-मंतर पर इस प्रदर्शन में भाग लिया और महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार या यौन उत्पीड़न को उनके कपड़े पहनने के सलीके से जोड़े जाने का विरोध किया. सैक़ड़ों की संख्या में महिलाएं हाथों में "सोच बदल, कप़ड़े नहीं", "मेरी छोटी स्कर्ट का तुमसे कोई लेना-देना नहीं है" जैसे नारे लिखी तख्तियां लेकर रोष जता रही थीं। तख्तियों पर लिखे स्लोगन के साथ नारे लगाते हुए जंतर मंतर पहुंचे कार्यकर्ताओं ने ढोल, ड्रम व ढपली की थाप पर महिलाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। इस "स्लटवॉक" में इंग्लैंड, जर्मनी, बांग्लादेश समेत कई देशों की महिलाएं भी शामिल हुईं।

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एक शाम, मैं सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर घिटोरनी मेट्रो स्टेशन से दिल्ली विश्वविद्यालय वापस आ रहा था. अगले स्टेशन से लोगों का जो रेला शुरू हुआ कि मुझे ‘शेर की मांद में आने वालो के पंजो के ही निशान मिलने वाली बात’ याद आ गयी. केवल आने वाले दिख रहे थे, जाने वाला कोई नहीं. एक सतत शाश्वत प्रक्रिया, ‘अगला स्टेशन ….. है’ की अनुगूंज, ट्रेन धीमी होती, दरवाजे खुलते, घर जाने को आतुर जन सैलाब अंदर घुसता. बाहर से आने वाले गतिज ऊर्जा से भरे हुए थे तो अंदर वाले, दब दब कर स्प्रिंग सदृश स्थितिज ऊर्जा से भरते जा रहे थे.