Dalit

एससी एसटी अत्याचार कानून फिर उसी दमखम के साथ लागू हो गया है जैसा सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले से पहले था। एससी एसटी अत्याचार संशोधन कानून में धारा 18-ए और जोड़ी गई है जो कहती है कि इस कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले ना जांच की जरूरत है और ना ही जांच अधिकारी को आरोपी की गिरफ्तारी से पहले किसी की इजाजत लेने की आवश्यकता।

Author: 
नवीन पाल
हममें से अधिकांश लोग डा. भीमराव अंबेडकर को एक अधिवक्ता, दलित नेता और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार के तौर पर पहचानते हैं। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि डा. अंबेडकर एक निपुण अर्थशास्त्री भी थे। उनके पास न केवल लॉ की डिग्री थी बल्कि उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी से 1915 व 1927 में क्रमशः अर्थशास्त्र में एमए व पीएचडी भी की थी।  
 

दलित विचारक व चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा है कि देश के दलितों के उत्थान की प्रक्रिया में आरक्षण के मुकाबले मुक्त बाजार व्यवस्था ज्यादा कारगर है। उन्होंने कहा है कि आरक्षण की व्यवस्था महज 10 प्रतिशत लोगों का फायदा कर सकती है जबकि मुक्त बाजार व्यवस्था में 90 प्रतिशत दलितों के उत्थान की क्षमता है। बाजारवाद के फायदों को गिनाते हुए चंद्रभान ने कहा कि यह बाजारवाद की ही देन है कि सदियों से जारी दलितों और गैर दलितों के बीच के रहन-सहन, खान-पान और काम-काज का फर्क समाप्त हो गया है। वह एशिया सेंटर फॉर इन्टरप्राइज (एसीई) द्वारा आयोजित पहले अंतर्राष्ट्रीय एशिया लिबर्टी फोरम (एएलएफ) के

लंबी अवधि में भारत की विकास दर तेज रहने के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं। मसलन भारत की आधी आबादी 30 साल से कम उम्र की है और इस उम्र में ये लोग वित्तीय मामलों में अधिक जोखिम उठाने के लिए तैयार होते हैं। जबकि एक 45 वर्ष का व्यक्ति वित्तीय मामलों में जोखिम नहीं ले सकता क्योंकि उसे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी के बारे में भी सोचना होता है।

Category: 

दलितों के हित में कई कानून बनाए गए हैं, यही सोचकर कि हमेशा से शोषित समाज को उनका हक मिल सके और कानून के भय से ही सही, उन्हें समाज में एक सम्मानजनक स्थिति मिल सके। लेकिन कानून किताबों में होता है और उसे लागू करवाने वाली संस्थाएं, पुलिस, वकील एवं न्यायाधीश अभी इसकी आत्मा से रूबरू नहीं हैं।

दलितों पर सवर्णो के अत्याचारों के बाबत मुकदमे दर्ज तो हो जाते हैं, पर ज्यादातर मुकदमे वे हार जाते हैं टेक्निकल गडबडियों के कारण। जबकि सर्वोच्च न्यायालय दूसरे मुकदमों में कहता रहता है कि टेक्निकल नुक्तों पर मुकदमे खारिज न करें, न्याय की दृष्टि से फैसला दें। 

अनेक वर्षों से कई सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा दलित समस्याओं को लेकर देश में जगह-जगह चर्चाएं-परिचर्चाएं की जाती रही हैं. सवाल उठाया जाता रहा है कि आखिर कब तक दलित पूरी तरह से आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहतर होगा और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेगा जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं. ऐसे सवाल भी उठाये जा रहे हैं जो दलितों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की गयी योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न आने को लेकर हैं.