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भारत और चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने पश्चिमी देशों के लिए संकट पैदा कर दिया है. अभी तक विकासशील देश अपने संसाधनों को स्वेच्छा से सस्ते मूल्य पर पश्चिमी देशों को उपलब्ध करा रहे थे. परिणाम स्वरूप पश्चिमी देशों के बीस फीसदी लोग विश्व के अस्सी फीसदी संसाधनों का उपभोग कर रहे थे. यह व्यवस्था स्थिर थी चूंकि  भारत स्वयं अपने संसाधनों का निर्यात करने को तत्पर था. पिछले दो दशक में भारत एवं चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने पश्चिमी देशों के इस सुख में अनायस ही अड़चन पैदा कर दी है. इन दोनों देशों ने संसाधनों की खपत स्वयं बड़े पैमाने पर चालू कर दी है.

भारत की ऊर्जा समस्या बड़ा आकार लेने वाली है। कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल के बड़े उत्पादकों ने हाल ही में कहा कि अगले कुछ सालों में उनके उत्पादन में बहुत कम वृद्धि होगी। जब देश में ईंधन की मांग बढ़ती जा रही है, तब देश के लिए यह बुरी ख़बर है।

इसका मतलब यह हुआ कि और अधिक ईंधन का आयात किया जाएगा और ऊर्जा कंपनियों के आयात खर्च और अधिक बढ़ते जाएंगे। इसका मतलब यह भी हुआ कि भारत का ऊर्जा क्षेत्र तेज़ी से असुरक्षित होता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की बाढ़ और मध्य-पूर्व के देशों में फैल रही अशांति जैसी घटनाओं से विश्व आपूर्ति में आयी बाधाओं और अस्थिर कीमतों के कारण यह कमज़ोरी आ रही है।

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