Census

प्रायः समाज शास्त्रियों, समता व समानता के पुरोधाओं और समाजसेवी राजनेताओं को शहरों की मलिन बस्तियों व झुग्गी झोपड़ियों की बढ़ती तादात पर अपने घड़ियाली आंसू बहाते और वहां रहने वाले लोगों के उद्धार के लिए भविष्य के वादों की घुट्टी पिलाते हम सबने सुना और देखा होगा। शहर की मलिन बस्तियों से संबंधित जब कोई रिपोर्ट किसी एनजीओ, कमेटी अथवा जनगणना आयोग द्वारा प्रकाशित की जाती है, अलग-अलग वर्ग द्वारा अपने अपने ढंग से इसे अमानवीय, यातना व नर्क जैसी उपमाओं से नवाजा जाना शुरू कर दिया जाता हो यहां तक कि शहरीकरण को ही इस पूरे वाकए के लिए दोषी साबित करने की भी होड़ शुरू हो जाती है। मजे की

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

भारत में कन्यओं को देवी माताओं का दर्जा दिया जाता है। उनकी शक्ति के रूप में पूजा की जाती है। साल में दो बार उत्तर भारत के लोग नवरात्र मनाते हैं। पूरे नौ दिन शक्ति की उपासना होती है। लेकिन इस बार की जनगणना के नतीजे देखकर क्या वे सोचेंगे कि इस कदर घट रही कन्या जन्म दर को देखते हुए मां दुर्गा के अलग - अलग रूपों की पूजने का क्या अर्थ है? सुनने में अजीब लगता है कि इन्हीं में से अधिकांश लोग पढ़े - लिखे और संपन्न होने के बावजूद घर में कन्या के जन्म लेने पर शोक मनाते हैं।

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