Anna Hazare

कुछ साल पहले मैंने इसी कॉलम में इस बात पर बड़ा आश्चर्य जताया था कि कैसे अमरिका के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें सजा भी मिल जाती है, लेकिन भारत में ऐसे ही अपराधों में शामिल व्यवसायी आसानी से बच जाते हैं। भारत में दरअसल भ्रष्ट राजनेताओं ने पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को इस तरह से अपंग बना दिया है कि तमाम स्तर की सुनवाइयों के बाद भी उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि इस तरह का सड़ा हुआ सिस्टम धूर्त उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार नहीं होने देगा, क्योंकि किसी भी तरह का घपला इन दोनों की मिलीभगत से ही अंजाम दिया जाता है। ऐसे में जब हमारा सिस्टम इन धूर्त राजनेताओं पर कार्रवाई करेगा, तब ही भ्रष्ट उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार किया जा सकेगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

हम यह तो जानते ही हैं कि हमारे मौजूदा सिस्टम में कहीं कुछ गड़बड़ है। इसके बावजूद बदलाव हमें असहज कर देता है। अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाए गए आंदोलन में हम एकजुट हुए और आंदोलन को सफल बनाया। लेकिन जब हम भ्रष्टाचाररोधी लोकपाल बिल का मसौदा बनाने बैठे तो अंतर्विरोध सामने आने लगे।

ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर निजी टिप्पणियां की गईं, दुर्गति के अंदेशे लगाए जाने लगे और यह भी कहा गया कि स्वयं लोकपाल भी तो भ्रष्ट हो सकता है। कुछ बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन को लोकतंत्र पर एक आक्रमण बताया।

जिन लोगों ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर कीचड़ उछालने की कोशिश की वे भूल गए कि भारत में हमेशा से मजबूत समाज और कमजोर सरकार रही है। 8 अप्रैल, 2011 को अन्ना हजारे के भूख हड़ताल खत्म करने से एक दिन पहले मैं काहिरा में लोकतांत्रिक आंदोलन के उदारवादी सदस्यों के सामने मिस्र के भविष्य का भारतीय मॉडल पेश कर रहा था। सम्मेलन के बाद हममें से कुछ तहरीर चौक पर घूमने गए थे, जहां सरकार के खिलाफ प्रचंड आंदोलन हुआ था। अचानक मैंने खुद को मंच पर पाया और अल हिंद के करीब 37,000 प्रदर्शनकारियों को अपनी शुभकामनाएं दीं। अगले तीन मिनट तक मैं भारतीय लोकतंत्र के सबक के बारे में बताने की कोशिश करता रहा-चुनाव, मुक्ति, समानता नहीं, बल्कि कानून के शासन के ही असल मायने है। भारत में इसलिए भ्रष्टाचार फैला हुआ है क्योंकि यहां कानून का शासन कमजोर है।

Author: 
गुरचरण दास

हम एक बेहद दिलचस्प समय में जी रहे हैं और हमारे समय की सबसे दिलचस्प घटना है अन्ना हजारे का राष्ट्रीय परिदृश्य पर उदय। हालांकि मैं उनकी प्रणाली से सहमत नहीं हूं, लेकिन करोड़ों भारतीयों में भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश की जो भावना है, उसमें जरूर मेरी सहभागिता है। जो दंभी राजनेता निजी जेट विमानों और चमचमाते वाहनों में बैठकर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रहे हैं, वे भारत में राजनीतिक सत्ता की सीमाओं को अभी समझ नहीं सके हैं। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि भारत में आमतौर पर समाज राज्यसत्ता पर हावी रहता है।

Author: 
गुरचरण दास

आजादी के बाद अनशन तो कई हुए, लेकिन अन्ना हजारे का अनशन अपूर्व था| इतने कम समय में इतनी जबर्दस्त प्रतिक्रिया पहले कभी नहीं हुई| श्रीरामुलू के अनशन ने आंध्रप्रदेश बनाया और तारासिंह और फतेह सिंह के अनशन ने पंजाब बनाया| अन्ना के अनशन ने अभी तक कुछ नहीं बनाया| लोकपाल भी नहीं| लेकिन इस अनशन ने सब सीमाएं तोड़ दीं| प्रांत, भाषा, जाति, मज़हब – कोई भी दीवार टिक न सकी| मानो पूरे देश में तूफान आ गया| चार-पांच दिन में ही सरकार की अकड़ ढीली पड़ गई| उसने घुटने टेक दिए|

भारत मे भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल विधेयक लाने की मांग कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हुये हैं और उन के द्वारा शुरु किये गये अन्दोलन मे मालूम पूरे देश भर का जन मानस जुड़ गया है. जैसे लोगों को अपनी दबी हुई कुंठा और व्यथा अभिव्यक्त करने के लिए एक मंच, एक आवाज़ मिल गयी हो.

देश भर के कार्यकर्ता इसे आजादी की दूसरी लड़ाई करार कर रहे हैं और इस काम में उनका साथ मेधा पाटकर, किरण बेदी, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, अरविंद केजरीवाल, एडवोकेट प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी भी शामिल हैं।

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