होटल

हम में से जो लोग बड़े शहरों में रहते हैं, वे अपने शहर को इतना चाहते हैं कि शायद ही कभी उसके भीतर झांककर देखते हैं कि जिस शहर में हम रह रहे हैं, उसमें चल क्या रहा है। इतना ही नहीं हमारे पास इतना वक्त ही नहीं होता कि थोड़ा आराम से बैठकर इस बारे में कुछ सोचें। शहरों में रहने वाले हम लोग हमेशा रोजमर्रा की जिंदगी के रोलर-कोस्टर पर होते हैं। आइए, इस लेख को पढ़ने के लिए लगने वाले वक्त में ही अपने शहर पर कुछ निगाह दौड़ा ली जाए। मैं आपको फुर्ती से एक विचार-यात्रा पर ले चलता हूं।
 
इस वर्ष फरवरी में मुझे राष्ट्रपति भवन में आयोजित कुलपतियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इस बहस का उद्‌देश्य भी अच्छा था और इसे बहुत ही अच्छी तरह संचालित किया गया था। देश के शीर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों के करीब सौ कुलपति सम्मेलन में मौजूद थे। इन्हें कई उप-समूहों में बांटकर देश में शिक्षा क्षेत्र के सामने उपस्थित ज्वलंत विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। हालांकि, सम्मेलन का स्वरूप थोड़ा औपचारिक था, लेकिन जिन विचारों पर चर्चा हुई वे सारे ज्वलंत व प्रासंगिक थे।
 

राजकोषिय घाटे को कम करने के उपाय के तहत किसी भी सरकार की निगाह सबसे पहले पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली भारी भरकम सब्सिडी पर ही केंद्रीत होती है। राष्ट्रीय आय को बढ़ाने में असफल सरकारें अपने घाटे को कम करने के लिए सबसे पहले सब्सिडी को ही घटाने का फैसला लेती हैं। कभी अंतराष्ट्रीय कीमतों का हवाला देकर तो कभी पेट्रोलियम कंपनियों को होने वाले नुकसान की बात कह सब्सिडी घटाने का काम किया जाता है। हालांकि थोड़ा-थोड़ा कर सब्सिडी घटाने का फायदा न तो अर्थव्यवस्था को मिल पाता है ना ही जनता को हमेशा के लिए इससे मुक्ति। और तो और कालाबाजारियों को लूट खसोट करने और पैसा बनाने का मौका