स्वार्थ

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।
 

"यदि आप ऐसे राजनेताओं को वोट देते आ रहे हैं जो आपको मुफ्त (दूसरों के खर्च पर) चीजें देने का वादा करते हैं, तब जब वे आपके पैसे से स्वयं सहित दूसरों को चीजें बांटते हैं, आपके पास शिकायत करने का अधिकार नहीं रह जाता है"

- थॉमस सोवेल

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एक मित्र ने पूछा है कि समाजवाद –परार्थवाद, अलट्रुइस्टीक व्यवस्था है, पूंजीवाद –स्वार्थवादी, सेल्फिश व्यवस्था है। आप परार्थवादी व्यवस्था का विरोध करते हैं और स्वार्थ की व्यवस्था का समर्थन करते हैं। इसका क्या कारण है?